5:16 pm Wednesday , 5 August 2026
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उझानी अमुआ की डार पर अब वो झूले कहाँ… सावन की पींगें बस यादों में

उझानी-बदांयू 5 अगस्त।

गुज़रे ज़माने की बातें हो गईं।
झूला तो पड़ गये अमुआ की डार पे री…
सावन आते ही गाँव की गलियों में गूंजता था ये गीत। हर पेड़ की डाली पर रस्सी का झूला, हर आंगन में कजरी, और हर दिल में सावन का सुरूर।

एक दौर था हरे-भरे पेड़ की मजबूत डाल से बंधी रस्सी का झूला, उस पर हंसती-खिलखिलाती दो सहेलियाँ, और बगल की डाली पर बैठकर ताली बजाती एक और सखी। पीछे खेतों की हरियाली और बरसात की सौंधी खुशबू… यही तो सावन का असली पोस्टकार्ड था।

वो दौर जब सावन का महीना आते ही गाँव की युवतियाँ और महिलाएँ हरी साड़ियाँ, हाथों में मेहंदी और पैरों में पायल पहन कर पीपल, नीम और आम की डार पर झूले डाल देती थीं।
रस्सी के झूले पर ऊँची-ऊँची पींगें बढ़तीं, तो साथ में फूटते थे मल्हार और सावन के गीत। काली घटा घिर आई, सावन आया है — गीतों की कड़ी टूटती, तो ठहाकों की कड़ी जुड़ जाती। झूला सिर्फ मनोरंजन नहीं था, वो सखियों के मिलने-जुलने, दिल की बात कहने और बरसात को दावत देने का बहाना था।

इस आधुनिक दौर में सब कुछ बदल गया।
अब सावन में पेड़ों पर रस्सी के झूले नजर नहीं आते। जगह ले ली है पार्कों के लोहे के झूलों ने और मोबाइल की स्क्रीन ने। कजरी की जगह रील का म्यूजिक है, और सामूहिक ठहाकों की जगह व्हाट्सएप का फॉरवर्ड मैसेज।
समय तेज़ हो गया, सुविधाएँ बढ़ गईं, पर शायद वो अपनापन कहीं पीछे छूट गया।

सावन सिर्फ मौसम नहीं है, ये यादों का मौसम है। झूला टूट सकता है, डाल पुरानी हो सकती है, पर जब तक एक भी लड़की अमुआ की डार पर पींग बढ़ाएगी, तब तक सावन अधूरा नहीं होगा।

काश! हम इस भागदौड़ में से थोड़ा वक्त निकालकर फिर से अपने बच्चों को पेड़ वाला झूला झुला सकें। ताकि अगली पीढ़ी भी जान सके कि सावन का असली मज़ा छत पर नहीं, डाल पर था।

राजेश वार्ष्णेय एमके।

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