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उझानी के बाजारों में एक तरफ सांड, दूसरी तरफ ठेले… हर कदम पर मौत का खतरा

उझानी के बाजारों में एक तरफ सांड, दूसरी तरफ ठेले…
सड़कों पर हर कदम पर मौत का खतरा।

स्कूल के बच्चे से बुजुर्ग तक दहशत में | “संविधान ने रास्ता दिया, व्यवस्था ने छीन लिया”। लोगों का सवाल: सुरक्षित चलना अधिकार है या साहस?

उझानी-बदांयू 17 जुलाई।

शहर की सुबह अब दुआओं से शुरू होती है।
“हे भगवान, बच्चा स्कूल से, पिता दफ्तर से और माँ बाजार से सकुशल घर लौट आए।”
क्योंकि आज सड़क पर निकलना मतलब हर कदम पर इम्तिहान देना है।

एक तरफ सड़क पर बैठे आवारा सांड और गाय। दूसरी तरफ सड़क घेरकर खड़े ठेले, रेहड़ी और अतिक्रमण। इनके बीच से गुजरने को मजबूर है आम आदमी, महिला, बुजुर्ग और स्कूली बच्चे।

हर दिन अखबार में एक नई खबर: कहीं सांड ने बुजुर्ग को पटक दिया, कहीं महिला घायल, कहीं बच्चा हादसे का शिकार। 2-4 दिन चर्चा, फिर सब शांत।

स्थानीय लोगों का दर्द एक ही है।संविधान ने रास्ता दिया, व्यवस्था ने छीन लिया।
जब सड़क पर चलना ही जान जोखिम में डालने जैसा हो जाए तो जीवन का अधिकार सिर्फ किताबों में रह जाता है।

पहले परिवारों का सपना आईएएस, पीसीएस, नीट, जेईई था। अब सबसे बड़ा सपना सिर्फ इतना है: सुबह घर से निकला अपना शाम को सुरक्षित वापस आ जाए।

समाजसेवियों का कहना है कि अब प्रशासन, नगर पालिका और जनप्रतिनिधियों को मिलकर स्थायी समाधान निकालना होगा। सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं, मनुष्यों के सुरक्षित जीवन के लिए होती हैं।

“सुरक्षित घर लौटना ही आज सबसे बड़ी उपलब्धि है।”
सड़क पर चलना साहस नहीं, सामान्य अधिकार होना चाहिए।
उझानी की पुरानी अनाज मंडी की मुख्य सड़कों पर आवारा मवेशी और अतिक्रमण के बीच जान जोखिम में डालकर निकलने को मजबूर हैं आम लोग। अगर आज आपका परिवार सुरक्षित घर पहुंच गया है तो समझिए यह किसी उपलब्धि से कम नहीं। पर सवाल है, कब तक?

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