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उझानी में “बीमारी का धंधा” बिना लाइसेंस के चल रहे दर्जनों अस्पताल, स्वास्थ्य विभाग सो रहा कुंभकर्णी नींद में

उझानी में “बीमारी का धंधा” बिना लाइसेंस के चल रहे दर्जनों अस्पताल, स्वास्थ्य विभाग सो रहा कुंभकर्णी नींद में।

उझानी-बदांयू 15 जुलाई।

शहर की गलियों में सफेद कोट वाले तो बहुत मिल जाएंगे, लेकिन असली डॉक्टर कितने हैं ये कोई नहीं जानता। यहां अवैध अस्पतालों और नर्सिंग होम का जाल इतना फैल चुका है कि सरकारी सिस्टम खुद दम तोड़ता नजर आ रहा है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि स्वास्थ्य विभाग की कार्रवाई सिर्फ फाइलों और नोटिस तक ही सीमित है। बिना रजिस्ट्रेशन, बिना डिग्री वाले “झोलाछाप” डॉक्टरों के सहारे दर्जनों क्लीनिक और नर्सिंग होम धड़ल्ले से चल रहे हैं।
पहले एक-दो बार सील का बोर्ड भी लगा, फोटो खिंची, अखबार में खबर छपी… और फिर? सब पहले जैसा। जो अस्पताल कल सील हुए थे, आज वहीं से मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। विभाग की इस ढिलाई से इन अवैध अस्पतालों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब उन्हें किसी का डर ही नहीं रहा।

सबसे खतरनाक बात ये है कि ये अवैध केंद्र इलाज के नाम पर सीधे मरीजों की जान से खेल रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक पहले भी गलत इलाज और गैर-कानूनी डिलीवरी के चलते कई महिलाओं की मौत के मामले सामने आ चुके हैं।
फिर भी मोटी फीस वसूलने के बाद जब हालत बिगड़ती है तो मरीज को आनन-फानन में बड़े शहर रेफर कर दिया जाता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

एक स्थानीय निवासी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, यहां इलाज कम और एक्सपेरिमेंट ज्यादा होता है। गरीब आदमी सस्ते के चक्कर में यहां आ जाता है और अपनी जान गवा बैठता है।

जब इस पूरे मामले पर CMO डॉ. विकास शर्मा से बात की गई तो उन्होंने कहा कि अवैध अस्पतालों के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है। जहां से भी शिकायत मिलती है, टीम भेजकर जांच कराई जाती है और नियम अनुसार सख्त कदम उठाए जाते हैं।

लेकिन सवाल वही है – अगर कार्रवाई हो रही है तो फिर ये अवैध अस्पताल दिन-ब-दिन बढ़ कैसे रहे हैं?

सवाल जनता का- जिन अस्पतालों को पहले सील किया गया था, वो दोबारा कैसे खुल गए?।
नोटिस के बाद फॉलो-अप जांच क्यों नहीं होती?
क्या स्वास्थ्य विभाग और इन अवैध सेंटरों के बीच कोई साठगांठ है?

फिलहाल उझानी में मरीजों के पास दो ही विकल्प हैं – या तो सरकारी अस्पताल की लंबी लाइन, या फिर इन अवैध नर्सिंग होम का महंगा और खतरनाक “इलाज”।

राजेश वार्ष्णेय एमके

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