12:40 pm Sunday , 19 July 2026
BREAKING NEWS

धर्म से बड़ी इंसानियत: मुस्लिम भाई ने निभाया बचपन का वादा, हिन्दू बहन का किया कन्यादान

उझानी-बदांयू 9 जुलाई ।

रिश्ते खून से नहीं, वादों से बनते हैं। और जब वादा इंसानियत का हो तो धर्म-जाति की दीवारें खुद-ब-खुद गिर जाती हैं। जनपद बदायूं के कस्बा उझानी में ऐसी ही एक मिसाल देखने को मिली, जिसने पूरे इलाके का दिल जीत लिया।

नगर के मोहल्ला साहूकारा में रहने वाले एक मुस्लिम भाई रियासत उर्फ़ बब्लू ने बचपन में अपनी हिन्दू बहन से किया वादा निभाते हुए उसकी शादी में कन्यादान किया।

साहूकारा निवासी स्व. हरीशंकर साहू की बेटी दीपांशी और मोहल्ले के ही दूल्हा कमलकांत वार्ष्णेय की बीती रात शादी एसएस ग्रीन लान में हर रस्म रीति के साथ हुई, बस फर्क इतना था कि मंडप में बेटी का हाथ थामने के लिए उसका सगा भाई नहीं, बल्कि मोहल्ले का वो भाई आया जिसे दीपांशी बचपन से भैया कहती आई है।

मोहल्ले वालों के मुताबिक बचपन से ही दोनों परिवारों में पड़ोसी होने के नाते गहरा लगाव रहा है। दीपांशी जब छोटी थी तभी उसके पिता की मृत्यु हो गई, वहीं कोरोना काल में उसकी मां मुन्नी देवी भी स्वर्ग सिधार गई। वह अपने मां बाप की अकेली संतान थी, तब उसने हंसी-हंसी में कहा था ” बब्लू भैया मेरी शादी में तुम ही मुझे विदा करना”। वो बात उस भाई ने दिल पर लिख ली। सालों बाद जब दीपांशी की शादी तय हुई तो उसने वही वादा निभाया।

बारात के स्वागत से लेकर कन्यादान और विदाई तक, हर जगह वो भाई एक पिता की तरह बेटी के साथ खड़ा दिखा। पंडित ने मंत्र पढ़े और उसने आंखों में आंसू लिए बहन का हाथ कमलकांत के हाथ में सौंपा।

शादी में मौजूद मोहित राज शर्मा इस नजारे को देखकर भावुक हो गए। किसी ने कहा “आज लगा कि रिश्ते मजहब से ऊपर भी होते हैं”। किसी की आंख भर आई तो किसी ने दुआएं दीं। उझानी की इस छोटी सी गली में उस दिन सिर्फ एक शादी नहीं हुई, इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल लिखी गई।

दीपांशी और बबलू की यह कहानी सिर्फ एक समारोह तक सीमित नहीं है। यह उन लोगों के लिए सबक है जो हर औरत में सिर्फ एक ही रिश्ता तलाशते हैं। यह कहानी बताती है कि प्रेम, सम्मान और वफा का कोई मजहब नहीं होता।


उझानी ने आज साबित कर दिया कि जब दिल बड़े हों तो कन्यादान करने के लिए खून का रिश्ता जरूरी नहीं, नीयत का रिश्ता काफी है।

राजेश वार्ष्णेय एमके

विज्ञापन एक्सप्रेस