शून्य और सन्नाटा: बदायूं जिले के अलापुर और ककराला क्षेत्र की राजनीति में आया यह बदलाव स्थानीय नेतृत्व के अभाव, राजनीतिक परिदृश्य के बदलने और परिसीमन (Delimitation) के कारण है।आपने जो दर्द बयां किया है, वह जमीनी हकीकत है। कभी जिला स्तर से लेकर प्रदेश की राजनीति में धमक रखने वाला यह इलाका आज सियासी तौर पर उपेक्षित महसूस कर रहा है।🏛️ कल चमन था: जब बोलती थी अलापुर की तूती एक दौर था जब इस क्षेत्र के नेताओं का कद इतना बड़ा था कि वे पूरे बदायूं जिले की राजनीतिक दिशा तय करते थे:सिनोद कुमार शाक्य (दीपू भैया): अलापुर निवासी सिनोद शाक्य ने दातागंज विधानसभा सीट से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर लगातार दो बार (2007 और 2012) विधानसभा चुनाव जीतकर क्षेत्र का परचम लहराया था।हाजी मुस्लिम खान: अलापुर थाना क्षेत्र के उपनगर ककराला निवासी हाजी मुस्लिम खान भी उसी दौर (2007) में उसहैत विधानसभा क्षेत्र (जो अब शेखूपुर का हिस्सा है) से बसपा के विधायक रहे।उस दौर में अलापुर-ककराला का हर फैसला जिले की राजनीति में भारी वजन रखता था।📉 आज क्यों ‘निल-सन्नाटा’ और खामोशी? (मुख्य कारण)बदलता हुआ राजनीतिक समीकरण: 2017 के बाद से उत्तर प्रदेश और विशेषकर बदायूं की राजनीति का ध्रुवीकरण पूरी तरह बदल गया। बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जिसका यह क्षेत्र कभी गढ़ हुआ करता था, सांगठनिक रूप से कमजोर हुई। स्थानीय कद्दावर नेताओं के पाला बदलने या मुख्यधारा से पीछे छूटने के कारण यहां एक बड़ा ‘नेतृत्व शून्य’ (Leadership Vacuum) पैदा हो गया। नई पीढ़ी और स्थानीय विकल्पों की कमी: पुराने नेताओं के बाद उस स्तर का कोई नया, सर्वमान्य स्थानीय चेहरा उभरकर सामने नहीं आया जो अलापुर की जनता की आवाज को लखनऊ तक मजबूती से पहुंचा सके। परिसीमन का प्रभाव: उसहैत विधानसभा सीट खत्म होने और क्षेत्रों के पुनर्गठन (शेखूपुर और दातागंज) के बाद अलापुर भौगोलिक और राजनीतिक रूप से मुख्य केंद्र बिंदुओं से थोड़ा कट गया, जिससे इसका पुराना रसूख धीरे-धीरे कम होता चला गया। यही वजह है कि जो कल तक ‘चमन’ था, आज वहां राजनीतिक रूप से सूनापन है और जनता के बीच यह खामोशी गहरी चर्चा और आत्ममंथन का विषय बनी हुई है।
badaunexpress.com badaunexpress.com | www.badaunexpress.com

