गंगा के घाट पर जिंदगी-मौत का खेल: गुरु पूर्णिमा पर मौतों से सीख लेकर लेने उतरा प्रशासन।
उझानी-बदांयू 30 मई।
कल गुरु पूर्णिमा है और कछला-अटैना घाट पर आस्था का सैलाब उमड़ेगा। पर इस सैलाब के साथ तैर रहा है खौफ भी। गंगा दशहरा पर डूबे 7 श्रद्धालुओं की चीखें अभी घाट की रेत में दफन नहीं हुई हैं। उन्हीं लाशों के बोझ तले दबा प्रशासन अबकी बार मैदान में है। डीएम अवनीश राय और एसएसपी अंकिता शर्मा ने शनिवार को घाट-घाट पर दस्तक देकर अफसरों को सीधी चेतावनी दे डाली।
उन्होंने कहा “बैरिकेडिंग लोहे जैसी हो, CCTV की आंख पलक न झपके, और गहरे पानी की तरफ जो झांके भी, उसे वहीं रोक दो।” डीएम-एसएसपी का फरमान साफ है। गोताखोरों की फौज, SDRF के जवान, पुलिस का पहरा और नगर पंचायत का अमला, सबको घाट पर झोंक दिया गया है। माइक से हर मिनट गूंजेगा: “जान है तो जहान है, खतरे से दूर रहो।”
पर सवाल चुभता है। पिछली बार भी तो यही दावे थे। कागजों पर इंतजाम फुलप्रूफ थे, मीटिंग में सब ओके था, फिर कछला में और अटैना में जिंदगियां गंगा लील गई। घरों में मातम पसरा और अफसर सिर्फ मगरमच्छी आंसू बहाते रहे।
अबकी बार कुर्सी दांव पर है। डीएम-एसएसपी की जोड़ी खुद सड़क पर है, क्योंकि जानते हैं कि एक और मौत हुई तो गद्दी हिल जाएगी। पर लाख टके का सवाल यही है: क्या वर्दी और फाइलों का खौफ गंगा की लहरों को रोक पाएगा? या कल फिर किसी मां की कोख सूनी होगी और प्रशासन कहेगा “भीड़ ज्यादा थी”?
गुरु पूर्णिमा का सूरज गवाह बनेगा। या तो प्रशासन मौतों का कर्ज उतारेगा, या फिर कागजी घोड़ों की लगाम फिर ढीली पड़ी दिखेगी। श्रद्धालु आ रहे हैं गुरु के दर्शन को, पर लौटेंगे जिंदा, इसकी गारंटी कौन लेगा? उझानी की हवा में आज बस यही एक सवाल तैर रहा है: “साहब, इस बार बचाओगे न?”
——- राजेश वार्ष्णेय एमके।



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