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केसे रूकेंगे हादसे, जब सरकारी अस्पताल में एमबीबीएस चिकित्सकों की है कमी।
उझानी बदांयू 11 मार्च।
बीते दिवस उझानी की सीएचसी में कोतवाली क्षेत्र के गांव दूदेनगर की प्रसूता नीरज कुमारी की मौत 100% चिकित्सकों की लापरवाही का परिणाम हो सकता है, क्योंकि सुबह 5 बजे एडमिट नीरज के आपरेशन के बाद दोपहर 12 बजे बच्चा हुआ ,शाम 5 बजे नीरज की हालत बिगड़ी, बताते हैं बीपी डाउन होने लगा। उस समय सरकारी अस्पताल में कोई महिला चिकित्सक तो छोड़िए पुरूष एमबीबीएस भी उपलब्ध नहीं था। नर्सिंग स्टाफ या राजकीय मेडिकल कॉलेज के ट्रेनी डॉक्टर जब तक बीमारी समझते तब तक नीरज की मौत हो चुकी थी।
नीरज कुमारी की मौत की वज़ह सीएचसी में चिकित्सकों का ना होना भी एक वजह हो सकता है, बिल्सी से काॅल कर बुलाई गई चिकित्सक सिर्फ आपरेशन करने आती है, आपरेशन कर वापस हो लेती है,ऐसा हुआ भी 12 बजे आपरेशन कर वह एक बजे बिल्सी चली गई। अस्पताल बंद होने पर संविदा चिकित्सक हिना सफदर भी चली गई। अधीक्षक डॉ सर्वेश कुमार बदायूं मीटिंग में चले गये। अब प्रसूता की हालत बिगड़ने पर उसे उपचार कोन मुहैया कराऐ।
ज्ञात रहे कल शाम नीरज कुमारी की मौत के बाद परिजनों ने महिला चिकित्सक पर रूपये लेने का आरोप लगाते हुए काफी ग़दर किया। एक ट्रेनी महिला चिकित्सक जो इमरजेंसी में ड्यूटी कर रही थी भीड के गुस्से से पुलिस कर्मियों संग मौजूद लोगों ने बचाया था।
आज भी सीएचसी पर बीयूएमएस डॉ हिना सफदर महिलाओं की ओपीडी में, वही इमरजेंसी सहित पुरूष ओपीडी में ट्रेनी चिकित्सक ही मरीजों को देखकर दवाएं लिख रहे थे।
जिले की महत्वपूर्ण सीएचसी वह भी ट्रेनी चिकित्सकों के हवाले, स्वास्थ्य विभाग को सोचना चाहिए कि अकेले एमबीबीएस अधीक्षक डॉक्टर सर्वेश कुमार कब-तक अकेले इस भार को उठा सकते हैं, अधीक्षक को मीटिंग सहित अन्य सरकारी योजनाओं को भी देखना पड़ता है। या सीएससी पर सिजेरियन आपरेशन को बंद करा दिया जाऐ। चिकित्सकों की कमी के चलते जैसे एक्सीडेंट के घायलों को बदायूं जिला अस्पताल या राजकीय मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है,उसी तरह गर्भवती महिलाओं को भी महिला अस्पताल रेफर कर दिया जाऐ। कम से कम प्रसूता चिकित्सकों की निगरानी में तो रहेगी। वर्ना ऐसे हादसे आऐ दिन होने से इंकार नहीं किया जा सकता।
राजेश वार्ष्णेय एमके।
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