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नाबालिग के हाथों में कमर्शियल ई-रिक्शा- सिस्टम की नाकामी और सरकार की नीति का मज़ाक

उझानी बदांयू 16 मई।

यह अत्यंत शर्मनाक और चिंता का विषय है कि आज सड़कों पर एक नाबालिग बच्चा कमर्शियल ई-रिक्शा चलाता हुआ देखा गया। यह न सिर्फ ट्रैफिक नियमों की घोर अवहेलना है, बल्कि सरकार द्वारा निर्धारित ई-रिक्शा नीति का खुलेआम मज़ाक भी है।

एक तरफ सरकार सड़क सुरक्षा और बच्चों के अधिकारों की बात करती है, दूसरी ओर ज़मीनी हकीकत यह है कि नाबालिग बच्चे ज़िम्मेदारी के भारी बोझ तले अवैध रूप से कमाई के साधनों में झोंक दिए जा रहे हैं। इससे यह साफ होता है कि प्रशासन, परिवहन विभाग, और बाल संरक्षण आयोग — सभी अपने कर्तव्यों में घोर लापरवाही बरत रहे हैं।

यह घटना सिर्फ एक नियम उल्लंघन नहीं है, बल्कि कानून व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाने और मानवाधिकारों का हनन है। एक नाबालिग द्वारा कमर्शियल ई-रिक्शा चलाना एक अपराध है, और इसके लिए न केवल उस ई-रिक्शा के मालिक को बल्कि उससे जुड़ी सारी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए।

ई-रिक्शा पंजीकरण और संचालन की मौजूदा स्थिति की समीक्षा कर दोषियों पर सख्त जुर्माना और लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई की जाए।

बाल संरक्षण आयोग इस मामले में स्वतः संज्ञान ले और ऐसे सभी मामलों की निगरानी के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन करे।

परिवहन विभाग यह स्पष्ट करे कि बिना दस्तावेज़ और उम्र सत्यापन के कैसे ऐसे वाहन चलाए जा रहे हैं।

यदि अब भी प्रशासन की नींद नहीं खुली, तो यह घटना आने वाले समय में कई मासूम ज़िंदगियों को खतरे में डाल सकती है और देश की कानून व्यवस्था पर एक और गहरा प्रश्नचिह्न लगा सकती है।

अब समय है—कागज़ों से बाहर आकर ज़मीनी कार्रवाई का।
कृपया इस लापरवाही को नज़रअंदाज़ न करें। यह सिर्फ एक बच्चा नहीं, एक पूरी पीढ़ी का भविष्य है जो दांव पर लगा है।

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