“स्क्रीन से सत्ता तक” – सोशल मीडिया बना लोकतंत्र का सबसे तेज हथियार।
पीएम मोदी से सीजेपी तक, तीन दिन में तीन पोस्ट और एक अनशन ने दिखा दी डिजिटल ताकत।
बदांयू 26 जुलाई।
कल तक जिसे “टाइमपास” कहा जाता था, आज वही सोशल मीडिया देश की राजनीति और जनता की आवाज का सबसे बड़ा मंच बन गया है।
पिछले तीन दिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फेसबुक और एक्स पर तीन बार सीधे छात्रों और देशवासियों से बात की। भारत जैसे देश के पीएम चाहें तो मीडिया खुद उनके दरवाजे आएगी, पर उन्होंने चुना सीधा संवाद – मोबाइल की स्क्रीन। यही इस युग की सच्चाई है।
जंतर-मंतर का अनशन, सोशल मीडिया ने पहुंचाया घर-घर।
सीजेपी काकरौच जनता पार्टी का जंतर-मंतर पर चला लंबा निर्णायक अनशन प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सुर्खियों से दूर रहा। हफ्तों तक कवरेज नहीं मिली।
लेकिन सोशल मीडिया के चैनलों ने इसे लाइव दिखाया। रील, पोस्ट और लाइव के जरिए पूरा देश देख रहा था। न कैमरा रुका, न आवाज। सीजेपी का संदेश बिना किसी फिल्टर के जनता तक पहुंचा।
इसी दौरान दिल्ली के कई इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने शिकायत की कि कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बदतमीजी की। सवाल ये है कि भरोसा टूटा तो क्यों टूटा? पत्रकारिता को भी आत्ममंथन करना होगा।
चौथा स्तंभ डगमगाया, पांचवा स्तंभ खड़ा हुआ।
पिछले कुछ वर्षों में पत्रकारिता का स्तर गिरा है। “देश का चौथा स्तंभ” आज कई बार कमजोर नजर आता है। उसकी जगह सोशल मीडिया ने ले ली है – तेज, निडर और बिना सेंसर के।
पहले सोशल मीडिया को भाव नहीं दिया जाता था। आज पीएम से लेकर सड़क के आंदोलन तक, सब इसी के सहारे चलते हैं। क्योंकि ये सबसे सस्ता है, सबसे तेज है और सबसे सीधा है।
अब खबरें अखबार के इंतजार में नहीं रुकतीं। न अनशन टीवी की ब्रेकिंग का मोहताज है। लोकतंत्र अब 280 कैरेक्टर और 30 सेकंड की रील में बोलता है।
सोशल मीडिया आ गया है… और ये रुकने वाला नहीं है।
सुशील धींगडा
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