बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बदायूं के लोगों ने वह दौर देखा है जब विकास के मुददे और संगठन की मजबूती हेतु पार्टी के पालनहार और संगठन के खेवनहार मिल बैठक चर्चा करके समस्या के समाधान और संगठन की मजबूती पर मंत्रणा करते थे परंतु पिछले एक दशक से ऐसी हालत देखने को मिल रही है कि भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस कोई राजनेतिक दल हो किसी दल के पदाधिकारी के बीच इस तरह की कोई बैठक नहीं होती और जो बैठक होती है उसमें अपनी हां में हां मिलाने वाले ही एकत्रित होते हैं और इसका मुख्य कारण संगठन में गुटबाजी नजर आती है जबकि इसका खमियाजा क्षेत्र को धरातल में ले जाने और संगठन को रसातल में पहुंचाने की राह बनाता दिखता है। बदायूं का सबसे बडा दर्द यही है जो जीत जाता है खुद की मेहनत बताता है और जो चुनाव में पराजित हो जाता ह ैवह पराजय का ठीकरा संगठन के साथ अपने विरोधियों के सिर फोड देता है। पता नहीं बदायूं के राजनेतिक दलों में कार्यकर्ताओं की यह गुटबाजी और पालनहारों का कार्यकर्ताओं की फौज अपने हिसाब बनाने का दौर कब खत्म होगा।
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