दायित्व और अधिकार जरूरी, एक से रहती नाव अधूरी !
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
जिस तरह जिन्दगी और जीवन एक दूसरे के पूरक हैं उसी तरह जीवन में दायित्व और अधिकार दोनों बहुत जरूरी हैं पर दिक्कत यह है कि हमारे बीच में जिनके पास अधिकार हैं वह दायित्व पूर्ण नहीं करते जबकि जो अधिकार की बात कहते हैं वह दायित्व पूर्ण नहीं करना चाहतें और इसी बात के चलते समाज अलग – थलग होता जा रहा है। पुत्र को माता – पिता और पूर्वजों की सम्पत्ति का अधिकार तो याद रहता है परंतु माता – पिता बोझ लगते हैं। पिता ने वक्त पर संस्कार की घुटटी पिलाने का दायित्व निभाया होता और लाड प्यार के समन्दर में संस्कार निभाने का दायित्व पूर्ण किया होता तो कितना अच्छा होता। क्या यह दिन देखने की स्थति का सामना करना पडता इस पर सभी को मंािन करना होगा। जीवन का सत्य है कि समय पर हम ध्यान नहीं देते और समय निकलने के बाद पछताने को मजबूर होते हैं। आज परिवार में रिश्ते टूट रहे हैं सब मानते तो है पर इसकी शुरूआत करने का दायित्व निभाना नहीं चाहते। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और दूर दुनिया की चमक हम सबको एक – दूसरे से दूर करती जा रही है इस दूरी को कम करने का दायित्व कब किसको याद आएगा और कब इंसान इस पर पछताएगा इसका इंतजार करने से कुछ नहीं होगा जो भी होगा कुछ करने से ही होगा।
badaunexpress.com badaunexpress.com | www.badaunexpress.com

