3:23 pm Sunday , 19 July 2026
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प्रेस की स्वतंत्रता पर सत्ता और स्वार्थ का ग्रहण

प्रेस की स्वतंत्रता पर सत्ता और स्वार्थ का ग्रहण

वजीरगंज से अनुराग मिश्रा की विशेष टिप्पणी

भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह देश की स्वतंत्रता, सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का इतिहास भी है। गुलाम भारत में जब अंग्रेजी हुकूमत का अत्याचार चरम पर था, तब पत्रकारिता ने केवल घटनाओं का वर्णन नहीं किया, बल्कि जनमानस में स्वतंत्रता की चेतना का संचार किया। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और अनेक निर्भीक पत्रकारों ने अपनी कलम को जनसेवा और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम बनाया।

उस दौर के समाचार पत्र जनता की आवाज़ थे। वे सत्ता के सामने झुकते नहीं थे, बल्कि अन्याय और शोषण के विरुद्ध खुलकर खड़े होते थे। यही कारण था कि उन अखबारों और पत्रकारों से प्रेरणा लेकर चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनेक क्रांतिकारी देश की आजादी के आंदोलन से जुड़े। पत्रकारिता तब एक मिशन थी, व्यवसाय नहीं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पत्रकारिता ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका निभाई। सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछना, जनता की समस्याओं को उजागर करना और प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करना पत्रकारों का धर्म माना जाता था। यहां तक कि आपातकाल जैसे कठिन दौर में भी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और साहस की मिसालें देखने को मिलीं।

लेकिन समय के साथ पत्रकारिता का स्वरूप बदलता गया। तकनीक और बाजारवाद के विस्तार ने मीडिया को नई ऊंचाइयां तो दीं, लेकिन साथ ही कई चुनौतियां भी खड़ी कर दीं। आज पत्रकारिता के एक बड़े वर्ग पर सत्ता के निकट रहने, राजनीतिक पक्षधरता दिखाने और व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता देने के आरोप लग रहे हैं। कई बड़े मीडिया संस्थानों और चैनलों पर यह प्रश्न उठने लगे हैं कि वे जनता के सवालों से अधिक सत्ता के गुणगान में व्यस्त हैं।

जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसके प्रवक्ता की भूमिका निभाने लगते हैं, तब लोकतंत्र कमजोर होता है। पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। यही कारण है कि आज समाज के एक वर्ग में मीडिया के प्रति अविश्वास बढ़ा है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में पत्रकारों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग होना इसी गिरते विश्वास का परिणाम है।

यह स्वीकार करना होगा कि पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति के लिए केवल जनता जिम्मेदार नहीं है। आत्ममंथन की आवश्यकता पत्रकार बिरादरी को भी है। यदि पत्रकार निष्पक्षता, ईमानदारी और जनहित को छोड़कर सत्ता, धन या व्यक्तिगत लाभ के प्रभाव में कार्य करेंगे, तो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा स्वाभाविक रूप से कम होगी।

हालांकि यह भी सत्य है कि आज भी देश में हजारों पत्रकार ऐसे हैं जो सीमित संसाधनों में, जोखिम उठाकर, सच्चाई को सामने लाने का कार्य कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अनेक पत्रकार जनसरोकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। यही लोग पत्रकारिता की उस गौरवशाली परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, जिसकी नींव स्वतंत्रता सेनानियों और निर्भीक कलमकारों ने रखी थी।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पत्रकारिता फिर से अपने मूल उद्देश्य की ओर लौटे। पत्रकार सत्ता का विरोधी नहीं होता, लेकिन वह उसका अंध समर्थक भी नहीं हो सकता। उसका दायित्व केवल जनता के प्रति है। पत्रकारिता का धर्म सत्य, निष्पक्षता और जनहित है। यदि मीडिया इन मूल्यों को पुनः अपनाए, तो जनता का विश्वास भी लौटेगा और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ फिर उसी मजबूती के साथ खड़ा दिखाई देगा, जिसके लिए उसे जाना जाता था।

प्रेस की स्वतंत्रता केवल पत्रकारों का अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवश्यकता है। जब कलम स्वतंत्र होगी, तभी समाज जागरूक होगा और लोकतंत्र सशक्त बनेगा।

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