रोटी नहीं, जन्नत का टुकड़ा है ‘दो जून की रोटी’।
हाड़तोड़ मेहनत के बाद थाली में सजा सुकून, दुनिया की हर दौलत से कीमती।
दो जून की रोटी: पेट की आग से सुकून के आसमान तक का सफर।
उझानी-बदांयू,2 जून।
गैस के चूल्हे पर नीली लौ को चूमकर जब रोटी फूलती है, तो वो सिर्फ आटे का गोला नहीं फूलता। फूलता है एक मजदूर का सीना, एक किसान का स्वाभिमान और एक परिवार का सुकून। ‘दो जून की रोटी’ मुहावरा नहीं, हिंदुस्तान की सबसे बड़ी हकीकत है।
‘जून’ का मतलब: वक्त से जुड़ी रोटी-
अवधी में ‘जून’ यानी ‘वक्त’। सुबह और शाम, दो वक्त का निवाला। ये वो न्यूनतम है जो इंसान को इंसान बनाए रखता है। महलों के 56 भोग नहीं, झोपड़ी की वो दो रोटी जो इज्जत से जीने की गारंटी दे।
मेहनत की भट्टी में सिंका हुआ सुकून-
तपती दोपहरी में ईंट गारे वाला, झुकी कमर से बीज बोता किसान, या 12 घंटे ठेला खींचने वाला जब शाम को घर लौटकर थाली में गरम रोटी देखता है, तो धरती पर ही जन्नत उतर आती है। उस एक ग्रास में दिनभर की जिल्लत, थकान और फिक्र सब पिघल जाते हैं।
दुनिया ने इश्क के हजार अफसाने सुने। पर जो इश्क एक गरीब को रोटी से है, जो जंग वो हर सुबह अपने बच्चों के लिए लड़ता है, उस पर तो सारी मोहब्बत की किताबें न्यौछावर।
रोटी नहीं, पूरी कायनात है ये-
दो जून की रोटी का इंतजाम सिर्फ पेट भरना नहीं है।
ये बाप का गुरूर है,जब बच्चे निवाला तोड़ते हैं।
ये मां की ममता है, जो खुद फाका करके सबको खिलाती है।
ये बच्चों का भविष्य है, स्कूल की फीस से लेकर किताबों तक का भरोसा।
जिनकी थालियों में चांदी के वर्क लगे हैं, वो क्या जानें कि खाली पेट सोने का दर्द क्या होता है। उनके लिए रोटी ‘कैलोरी’ है, यहां रोटी ‘जिंदगी’ है।
आज की कसौटी पर ‘दो जून’
महंगाई की आंच तेज है। आटा-दाल की कीमतें हर महीने मजदूर की हिम्मत तोलती हैं। ऐसे में राशन की दुकान और मनरेगा की दिहाड़ी ही लाखों घरों का चूल्हा दोनों जून जलाए हुए है।
अगली बार तवे पर रोटी फूले तो आंख बंद करके शुक्रिया कहना। उस हाथ का जिसने गेहूं बोया, उस पीठ का जिसने बोझा ढोया, और उस किस्मत का जिसने आपको भूखा नहीं सुलाया।
क्योंकि ‘दो जून की रोटी’ दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है। ये मिल जाए, तो समझो सब मिल गया।
राजेश वार्ष्णेय एमके
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