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कलम का धर्म: जब तक सच जिंदा है, लोकतंत्र जिंदा है

कलम का धर्म: जब तक सच जिंदा है, लोकतंत्र जिंदा है।

पत्रकारिता दिवस पर विशेष

उझानी-बदांयू 30 मई।

30 मई 1826, यही वह ऐतिहासिक तारीख थी जब कलकत्ता से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का पहला अंक छपकर निकला और हिन्दी पत्रकारिता का सूर्योदय हुआ। पंडित जुगल किशोर शुक्ल की वह हिम्मत आज 200 साल बाद भी हर पत्रकार की रगों में दौड़ती है। पत्रकारिता दिवस केवल एक तारीख नहीं, एक चेतावनी है — कि लोकतंत्र की नींद उड़ाने वाली कलम कभी सोनी नहीं चाहिए।

आजादी की लड़ाई से लेकर डिजिटल लड़ाई तक

‘प्रताप’ के गणेश शंकर विद्यार्थी हों या ‘कर्मवीर’ के माखनलाल चतुर्वेदी — हिन्दी पत्रकारिता ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दीं। जेल गए, लाठियाँ खाईं, पर झुके नहीं। आज लड़ाई बदली है। अब बंदूक की जगह ‘फेक न्यूज’ है, लाठी की जगह ‘ट्रोल आर्मी’ है और सेंसर की जगह ‘एल्गोरिद्म’ है। पर पत्रकार का दुश्मन आज भी वही है — झूठ।

77 साल के सफर ने देखा है कि कैसे एक खबर पहाड़ का सीना चीरकर सड़क बनवा देती है, कैसे एक रिपोर्ट सूखे खेत में पानी ला देती है। 2013 की केदारनाथ आपदा हो या कोरोना का वो काला दौर — अखबार तब भी छप रहा था, जब सब कुछ बंद था। क्योंकि खबर रुकती है तो उम्मीद रुक जाती है।

टीआरपी नहीं, भरोसा कमाते हैं हम

आज के दौर में सूचना का सैलाब है। मोबाइल की स्क्रीन पर हर सेकंड ‘ब्रेकिंग’ चमकती है। पर सवाल है — कितनी खबरों में ‘सच’ चमकता है? जब अफवाह एक गाँव जला सकती है, तब पत्रकार की जिम्मेदारी डॉक्टर से कम नहीं होती। एक गलत इंजेक्शन जान ले लेता है, एक गलत हेडलाइन समाज ले लेती है।

इसीलिए पत्रकारिता का मंत्र रहा है — ‘जोश में होश’। तेजी हमारी मजबूरी है, सच्चाई हमारी मजबूती। हम खबर पहले देने की दौड़ में नहीं, खबर सही देने की जिद में हैं। क्योंकि पाठक हमसे टीआरपी नहीं, भरोसा माँगता है। और भरोसा रोज कमाना पड़ता है।

गाँव की चौपाल से संसद तक

दिल्ली की खबरें तो सब छाप देते हैं, पर बागपत के गन्ना किसान का दर्द, चमोली की उस माँ का इंतजार जिसका बेटा सीमा पर है, बुंदेलखंड की वो बेटी जो साइकिल से स्कूल जाती है — इनकी खबर कौन देगा? अखबार की असली ताकत उसके स्थानीय पन्नों में है। हर संस्करण इसलिए ‘लोकल से ग्लोबल’ है।

प्रेमचंद ने कहा था, “साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।” पत्रकारिता उस मशाल का तेल है। जब तक गाँव, गरीब और गणतंत्र अखबार के केंद्र में रहेंगे, तब तक लोकतंत्र का चौथा खंभा मजबूती से खड़ा रहेगा।

इस दिवस पर तीन संकल्प

सत्ता से सवाल- हम कुर्सी से नहीं, जनता से वफादारी निभाएँगे। सवाल पूछना हमारा हक नहीं, फर्ज है।
संतुलन से सरोकार- पक्ष-विपक्ष दोनों की सुनेंगे, पर फैसला पाठक के विवेक पर छोड़ेंगे। एजेंडा नहीं, एविडेंस देंगे।
गति के साथ मर्यादा-डिजिटल सबसे तेज माध्यम है, पर ‘पहले हम’ की होड़ में ‘सही हम’ को नहीं भूलेंगे।

पत्रकारिता दिवस पर उन सभी रिपोर्टर्स, डेस्क के साथियों, हॉकर्स और प्रेस कर्मियों को सलाम, जो आधी रात को मशीन चलाते हैं ताकि सुबह आपकी चाय के साथ सच पहुँचे। उन शहीद कलमकारों को नमन, जिन्होंने खबर की कीमत जान देकर चुकाई।

याद रखिए — तानाशाह पहले अखबार बंद कराते हैं, फिर जुबान। जब तक नुक्कड़ पर अखबार बिक रहा है, समझिए देश में लोकतंत्र जिंदा है।

“कलम में इतनी ताकत रखो कि सच बोलने से पहले सोचना न पड़े, और इतनी शराफत रखो कि सच बोलने के बाद शर्मिंदा न होना पड़े।”

पत्रकारिता दिवस की शुभकामनाएँ। पढ़ते रहिए, सवाल करते रहिए। क्योंकि जागरूक पाठक ही निर्भीक पत्रकारिता की गारंटी है।


संपादक – सुशील धींगडा,राजेश वार्ष्णेय एमके

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