लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियॉं जलाने में।
देर तक लोगों की तालियॉं गूँजती रहीं थी उस 2005 के बदायूं महोत्सव मे जब वशीर साहब के इन जैसे अनगिनत शेर पर बदायूं के लोगों की आह और वाह निकली थी और मेरी ऑंखों में न जाने कितने जलते हुए घरों के मंज़र तैरते रहे, जब मुशायरा ख़त्म हुआ तो दोस्तों के साथ हम लोग शायरों से मिलने लगे, पापा डॉ उर्मिलेश के निमंत्रण पर आये बशीर बद्र साहब से मिलते हुए उनका ऑटोग्राफ लेने की ख़्वाहिश हुई, उन्होंने बड़ी मुहब्बतों से मेरी डायरी के पन्नों पर दस्तख़त करके हुए वही शेर लिख दिया और कहा था भतीजे तुम शायरी को दिल से सुनते हो, ये शौक़ बरक़रार रखना। इस साल उन्हें बदायूं महोत्सव के मंच पर फानी – शकील अवार्ड से सम्मानित किया गया था उस साल उन्होंने कवि सम्मेलन ओर मुशायरा दोनों मे पड़ा था
उसके बाद दुबारा वो मौका नहीं मिल सका क्यों की बशीर साहब काफी लम्बे समय से लगभग कोमा में जा चुके थे, बड़ी मुश्किलों से लोगों को पहचान पाते थे, एक लम्बे अरसे तक उसी हालत में रहने के बाद आज उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
उन्हें जब पद्मश्री एवार्ड मिला था तो लगा था कि जैसे पद्मश्री को वो मिल गये हों, उर्दू दुनिया में इस अहद का सबसे बड़ा शायर आज दुनिया से कूच कर गया।
बशीर साहब, आपको अलविदा कह रहा हूँ और ज़ह्न में आपके ही अशआर चल रहे हैं….
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
ना जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाये।
मैं ख़ुद ही एहतियातन उस तरफ़ से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यूँ मेरे लिये बदनाम हो जाये।
बदायूं ओर बदायूं के अदब पसंद लोग उन्हें हमेशा याद रखेंगे उनके सदाबहार शायरी उनकी याद हमेशा लोगों के दिलों दिमाग़ पर ताज़ा रहेगी
बदायूं महोत्सव के मंच पर वशीर बद्र, डॉ उर्मिलेश, गोपाल दास नीरज एवं तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी
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