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उझानी, 23 मई 2026।
बिजली के संकट ने उझानी में पेयजल सप्लाई की सांसें फुला दी हैं। पिछले दो दिनों से शहर के साहूकारा, किला, खेड़ा समेत दर्जनभर मोहल्लों में नलों से बूंद तक नहीं टपकी। आलम ये है कि सुबह होते ही लोग बाल्टी-डिब्बे लेकर सड़कों पर निकल पड़ते हैं—किसी के हिस्से हैंडपंप की लाइन तो किसी के हिस्से टैंकर का इंतजार।
जनरेटर हुए कंडम, बैटरी ने दिया धोखा
नगर पालिका के किलाखेड़ा ओवरहेड टैंक पर लगा 62 केवी का जनरेटर और देवनागरी स्कूल के पास वाला जनरेटर देखरेख के अभाव में कबाड़ हो चुके हैं। जलकल प्रभारी तौसीफ अहमद खुद मानते हैं—“दोनों जनरेटरों की बैटरी खराब पड़ी है। अगर नगर पालिका इन्हें ठीक करा दे तो जनता को पानी की दिक्कत न हो।” बिजली जाते ही पानी की सप्लाई ठप, और बैकअप का सहारा भी नहीं।
ट्यूबवैल ऑपरेटर बोले—टू-फेज में कैसे चले मोटर
ट्यूबवैल ऑपरेटर सुरेश वार्ष्णेय ने बताया, “दो दिन से बिजली टू-फेज आ रही है। मोटर चल ही नहीं पा रही। कई बार बिजली विभाग को सूचना दी, मगर कोई लाइन सही करने नहीं आया।” वहीं दूसरे ऑपरेटर कुलदीप का कहना है, “टू-फेज सप्लाई से मोटर जलने का डर रहता है। मजबूरी में बंद रखनी पड़ रही है। शिकायत कर-करके थक गए, लेकिन विभाग से कोई झांकने तक नहीं आया।”
घर-घर सूखे नल, सड़कों पर लगी कतारें
साहूकारा की गली हो या किलाखेड़ा, बाजार कलां का छोर, हालात एक जैसे हैं। पीने के पानी को लोग भटकते दिखाई दिए। महिलाएं बाल्टी , डिब्बे लेकर हैंडपंप ढूंढती रहीं, तो बच्चे टैंकर के पीछे बाल्टी लेकर दौड़ते नजर आए। सुबह स्कूल जाने से पहले बच्चों की पहली ड्यूटी पानी भरना बन गई है।
किलाखेडा मोहल्ले के बुजुर्ग रमेश कहते हैं—“दो दिन से नहाना तो दूर, पीने को पानी नहीं मिला। जब बिजली नहीं तो टैंकर कहां से आऐ”
हर घर जल का दावा, हकीकत में हांफते नल
कागजों में पाइपलाइन बिछ चुकी है, ओवरहेड टैंक खड़े हैं, मगर बिजली कटते ही पूरा सिस्टम बैठ जाता है। जनरेटर शोपीस बने खड़े हैं। गर्मी में पानी की खपत डेढ़ गुनी हो गई है, लेकिन सप्लाई के नाम पर सिर्फ आश्वासन।
लोगों में आक्रोश
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर पालिका ने समय रहते जनरेटर ठीक नहीं कराए और बिजली विभाग लाइन सुधारने को तैयार नहीं। अब हालात ये हैं कि रसोई का चूल्हा तब जलता है जब पानी का इंतजाम हो जाए।
दो दिन से जारी इस संकट ने उझानी की प्यास बढ़ा दी है। अगर जल्द बिजली और जनरेटर का जुगाड़ न हुआ तो आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ सकते हैं। फिलहाल शहर की सुबह पानी की तलाश से शुरू होती है और शाम थके हुए कदमों के साथ ढल जाती है।
राजेश वार्ष्णेय एमके।

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