दवा नहीं, दुआ के भरोसे सफर: बदायूं डिपो की बसों में फर्स्ट-एड बॉक्स बने शोपीस।
110 में 90 बसों में दवा गायब, चोट लगे तो मरहम लगाएगा कौन? यात्री बोले- जान हथेली पर लेकर चलते हैं।
बदांयू 16 मई।
बदायूं रोडवेज का दावा है ‘सुरक्षित और सुगम यात्रा’। हकीकत यह है कि बदायूं डिपो की बसों में चढ़ो तो दवा की जगह दुआ मांगकर बैठो। किसी को चक्कर आ जाए, चोट लग जाए या बच्चे को बुखार चढ़ जाए तो बस में रुई-पट्टी तक नहीं मिलेगी।
बदायूं डिपो की 110 बसों में से सिर्फ 20 नई बसों में फर्स्ट-एड बॉक्स भरे हैं। बाकी 90 बसों में या तो बॉक्स खाली टंगे हैं या गायब ही हैं। कुछ बसों में बॉक्स हैं तो दवाएं दो साल पहले एक्सपायर हो चुकी हैं। 150 रुपये की दवा पर निगम की ऐसी कंजूसी कि यात्री की जान जोखिम में डाल दी।
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कागजों में खरीद, बस में खाली डिब्बा- नियम है कि हर बस में दर्द की गोली, पट्टी, रुई, बीटाडीन, बैंडेज जरूरी है। खरीद भी हर साल कागजों में हो जाती है। पर बस में चढ़ो तो फर्स्ट-एड बॉक्स मुंह चिढ़ाता मिलता है। सूत्र बताते हैं कि दवा खरीद का खेल सिर्फ फाइलों तक है।
परिचालक दबे जुबान कहते हैं, “साहब, किसी की तबीयत बिगड़े तो हम क्या करें? पानी पिलाकर बैठा देते हैं। अस्पताल कितनी दूर होगा, पता नहीं।”
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यात्री बोले- भगवान भरोसे हैं हम सिविल लाइंस निवासी मोहित गुप्ता रोज बरेली जाते हैं। बोले, “पिछले हफ्ते एक बुजुर्ग को चक्कर आ गए। बस में न दवा थी न पानी। कंडक्टर ने अपनी बोतल से पानी पिलाया। ये हाल है रोडवेज का।”
कचहरी रोड के रिजवान का कहना है, “बच्चे के साथ सफर करो तो डर लगता है। बुखार आ जाए तो पूरी बस में एक पैरासिटामोल नहीं मिलेगी। टिकट पूरा लो, सुविधा जीरो दो।”
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एआरएम का रटा-रटाया जवाब- बोले, “बॉक्स चेक होते हैं। एक्सपायरी दवा बदलते हैं। टूटे बॉक्स वर्कशॉप से दिए जाते हैं। जिनमें नहीं हैं, रिपोर्ट लेकर लगवाएंगे।” यही जवाब हर बार मिलता है, पर बसों में दवा आज तक नहीं पहुंची।
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बॉक्स में होना चाहिए ये सामान-दर्द निवारक गोली, पट्टी, रुई, बैंडेज, बीटाडीन, ओआरएस। पर बदायूं डिपो की बसों में ये सिर्फ लिस्ट में हैं, हकीकत में नहीं।
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