महिला के बिल पर बहस में लोकतंत्र तहस नहस क्यों !
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
संसद में पेश होने वाले महिला सशक्तिकरण बिल को लेकर सडकों पर ऐसी बहस छिड गई है जिसमें सत्ताधारी और विपक्षी राजनेतिक दल अपनी बात को अपने ढंग से करते नजर आ रहे हैं जिसको लेकर आम आदमी को लग रहा है कि बहस की इस प्रक्रिया ने विश्व के सबसे लोकतांत्रिक देश की उलझन में डाल दिया है। लोगों का मानना है कि सदन में बिल पास क्यों नहीं हुआ इसके पीछे कारण क्या था यह बात सदन में पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए परंत देश के राजनेताओं ने इसको सदन की जगह जनता के बीच डालने का काम किया। अगर इस बिल पर सत्ताधारी और विपक्ष बिल की त्रुटियों और विषेशताओं पर सदन में सुधार करते तो कितना अच्छा होता और भारतीय लोकतंत्र का महत्व कितना अच्छा संदेश देता जबकि राजनेताओं की राजनीति के चलते महिला सशक्तिकरण बिल की राजनीति सडकों पर ना दिखती और अगर बदायूं जैेसे छोटे से जिले में तमाम सडकों और पंचायतों पर महिला बिल को लेकर बहस छिडने का माहौल बन गया तो राजनेतिक रूप से जागरूक जनपदों में इस पर जमकर बहस हो रही होगी। महिला सशक्तिकरण बिल देश और समाज की जरूरत है और उस पर फुटबाल जैसा खेल होता नजर आए तो हर आदमी के दिल में एक ही बात आएगी कि हमारे लोकतंत्र के वह पालनहार लोंकतंत्र में क्या विश्वास है जो दूसरे की बात को सुनना नहीं चाहते की राह पर निकल पडे हैं।
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