7:28 am Tuesday , 21 July 2026
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बदायूं में राजनेताओं का मीडिया से सौतेले व्यवहार का कारण क्या ?

बदायूं में राजनेताओं का मीडिया से सौतेले व्यवहार का कारण क्या ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
देश की आजादी में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की भूमिका किसी से छिपी नहीं और सर्वविदित है। बदायूं में मीडिया के पूर्वजों पुतन्ने बाबू, रमेश चंद्र रस्तोगी, प निहाल चंद्र शर्मा, राम प्यारे ग्रोवर, निजामी साहब, अब्दुल मजींद शादा, कृष्ण कांति रस्तोगी, पवन सक्सेना, मनोहर लाल बजाज, कन्हैया लाल शर्मा, एसपी सिंहा बंधु, इब्ने बख्शी ऐसे नाम है जो सरकार कोई हो उन्होंने बदायूं के विकास के लिए हर समय प्रयास किया लेकिन देश की आजादी के आठवें दशक तक बदायूं के राजनेतिकों ने मीडिया के साथ जो सौतेला व्यवहार जो पूर्व की सरकारों ने किया वहीं आज भी बदस्तूर जारी है। बदायूं के राजनेताओं को आजादी से लेकर अब तक जिले में कोई ऐसा मीडिया प्रहरी नहीं मिला जो जनपद, प्रदेश अथवा राष्ट्रीय स्तर की किसी कमेटी के सदस्य बनने के लायक होता और तो और जिले मे ंना जाने कौन – कौन जेल विजीटर बने, कौन कौन – कौन रेलवे समिति के सदस्य बनाये लेकिन कभी मीडिया के किसी प्रहरी को इस लायक नहीं समझा गया कि उनमें से किसी को किसी समिति का प्रभारी तो दूर सदस्य बनवा दिया होता। कांग्रेस के शासन की बात होती तो मानी जा सकती थी लेकिन इस मामले में भाजपा सरकार का वही रवेया अब तक जारी है जो पूर्व की गैर भाजपा सरकारों का था। अब ऐसे में एक ही बात हर मीडिया प्रहरी के मस्तिष्क में आती है कि कहीं ऐसा तो नहीं लोकतंत्र के चाथे स्तम्भ के प्रहरियों का जनपद के राजनेताओं ने उपयोग और प्रयोग तो खुलकर और जमकर किया लेकिन मीडिया का उपयोग उसी तरह किया जैसे किसी बारात अथवा समारोह में बैंडबाजे वालों का किया जाता है, अगर ऐसा ना होता तो कम से कम मीडिया से जुडे किसी प्रहरी को पार्टी स्तर से नगर पालिका, जिला पंचायत, विधानसभा अथवा लोकसभा चुनाव में कम से कम कोई एक उम्मीदवार तो बनाया होता।

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