7:29 am Tuesday , 21 July 2026
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वह कौन है, वो कौन है जो बाहर से आते हैं और बदायूं आकर बस अपना राग सुनाते है ?

वह कौन है, वो कौन है जो बाहर से आते हैं और बदायंू आकर बस अपना राग सुनाते है ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बदायूं की राजनीति में बाहर से आकर अपना प्रभाव दिखाने वाले हमेशा हावी रहे और हमेशा जो सत्ताधारी दल हुआ उसमें बाहर वालों ने हमेशा बदायूं वालों को दोयम दर्जे के निरीह समझ कर अपनी छलनी में छानकर मलाई का सेवन किया और मजेदार बात यह है कि बाहर से आकर बदायूं में जलवा दिखाने वालों की लम्बी फेहरिस्त है और इस बात की वास्तविकता और परिणाम किसी से छिपा नहीं है फिर से पिछले चालीस साल से बदायूं वालों को यही सब देखने और सहने को मजबूर होना पड रहा है। कभी इलाहबाद, कभी कुशीनगर, कभी सैफई, कभी शाहजहापुर के लोगों को बदायूं की राजनेतिक प्रयोगशाला में प्रयोग किया गया और परिधाम भी देखा और भुगता भी है लेकिन बदायूं के लोगों को बदायूं से पालनहार देने मे ंहमेशा गुरेज किया गया।
अब बीते कल की बात करे तो सत्तर साल राज करने वाले एक राजनेतिक दल को आज बदायूं जिले में जिलाध्यक्ष बाहर के व्यक्ति को बनाया गया जबकि कभी बदायूं में अपनी पार्टी का अभेद किला होने का दावा करने वाले राजनेतिक दल को लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवार की घोषणा को लेकर कितने पापड बेलना पडे वह किसी से छिपा नहीं है और अन्ततः उम्मीदवार बदल कर हालात से समझौता करना पडा और वर्तमान में क्या – क्या हो रहा है उसको वर्तमान में विश्वास की गंगा बहाने का दावा करने वाले और दरियां बिछाकर अपने राजनेतिक दल को फर्श से अर्श तक पहुंचाने वाले लगभग सभी जानते हैं कि एक पद पर रहते पदाधिकारी को बदायूं में भेजकर प्रयोग किस लिये किया गया और मतदाता द्वारा प्रयोग को विफल करार दिये जाने के बाद अब तक पदाधिकारी को सगठन में कार्यकर्ताओं पर क्यों थोप रखा है और कब तक थोपा जाएगा। क्या बदायूं और अपनी – अपनी विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ता सदैव केवल दरिया बिछाने की भूमिका तक सीमित रखे जाएगें तो सबका विश्वास कैसे बनेगा और इसका क्या परिणाम होगा क्या वह आने वाले विधानसभा चुनाव में फिर उसी तरह सामने नहीं आएगा जैसे लोकसभा चुनाव में आवंला और बदायूं सीट पर देखने को मिला था।

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