बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बदायूं की राजनीति मे ंना जाने कौन सा खेल चल रहा है जहां अपनों को अपने फूटी आंख नहीं सुहा रहे हैं, पता नहीं क्यों अपनों का दिल दुखाके अपने मुस्करा रहे हैं। यहां चुनाव में हारे हुए तो क्या जीतने वाले राजनीति की शतरंज में अपनों से मात खा रहे हैं। पहले एक ंचेयरमैन अपनों की चाला का शिकार होकर चुनाव हार गई जबकि संसदीय चुनाव में अपनों ने तत्कालीन सांसद को ऐसी मात दी जो हाईकमान ने टिकट के लायक नहीं समझा। एक विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनों की राजनीति और दांवपेंच का ऐसा शिकार हुए कि मुकदमा दर्ज हो गया ओर अब उनके टिकट कटवाने के लिए इधर से उधर दांव चले जा रहे हैं जबकि एक बहुचर्चित मामले को लेकर सुर्खियों में चल रहे एक विधायक आरापों के ताने बाने में फंसते नजर आ रहे है।
यह सारे दांव पेंच एक एक राजनेतिक पार्टी को लेकर चर्चा में बने हुए है जिसे संगठित और समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए जाना जाता है और कार्यकर्ताओं को देवतुल्य कहने की परम्परा सर्वोपरि मानी जाती है जबकि कभी बदायूं की राजनीति में परमोत्कर्श रूप दिखाने वाले राजनेतिक दल की को लेकर चलने वाली चर्चाओं का चितंन करें तो साफ दिखता है कि वहां पर हालात इससे भी अधिक खराब हैं। वहां हालत यह है कि वहां सफाई मुक्त के नाम पर काफी जंग के रंग दिख रहे हैं। एक पूर्व मंत्री के साथ मिलकर दूसरे पूर्व मंत्री ने अपने ही पूर्व सांसद की जडों में ऐसा मठठा लगाया कि उनको बदायूं छोडकर जाना पडा। पूर्व संासद के सबसे करीबी एक विधायक आज कल विरोेधी खेमें के झूले पर पींगे भरते नजर आने के कारण चर्चा में हैं जबकि एक पूर्व मंत्री एक मौजूदा विधायक का टिकट कटवाने के लिए खुले मैदान बासुरी बजाते नजर आ रहे हैं। चर्चाओं को लेकर पर्दे के पीछे हो रही खेमें बाजी को देखें तो ऐसा लग रहा है कि दो शेरों की लडाई कराने की योजना पार्टी के पारंगत वह चचा जान करा रहे हैं जो दोनों की जंग में अपने पुत्र को टिकट मिलने की राह बन जाने का सपना देख रहे हैं।
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