, वजीरगंज।
माघ माह आते ही क्षेत्र के गांवों में भक्ति और श्रद्धा का अनुपम दृश्य देखने को मिलता है। ठंड की परवाह किए बिना सुबह तड़के ही छोटी-छोटी बच्चियां और महिलाएं स्नान-ध्यान कर मंदिरों में पूजा-अर्चना के लिए पहुंच जाती हैं। हाथों में पुष्प लेकर भगवान के चरणों में श्रद्धा अर्पित करती हैं। इसी के साथ गांवों में सदियों पुरानी कीर्तन परंपरा आज भी पूरे उत्साह और भक्ति भाव से निभाई जा रही है।
सुबह होते ही श्रद्धालु ढोलक, मजीरा और झांझ लेकर गलियों में निकल पड़ते हैं। भगवान के भजनों और कीर्तन की मधुर धुन से पूरा गांव भक्तिमय हो उठता है। सुरसैना, नदबारी, सहाबर समेत आसपास के कई गांवों में यह दृश्य देखने को मिलता है, जहां लोग प्रेम और श्रद्धा के साथ प्रभु का गुणगान करते हैं।
कीर्तन करने वाले श्रद्धालु जब घर-घर पहुंचते हैं तो ग्रामीण भी उनका स्वागत बड़े आदर भाव से करते हैं। लोग अपने घरों में भी कीर्तन का आयोजन करवाते हैं और श्रद्धालुओं को चाय, बिस्कुट व प्रसाद आदि देकर सम्मानित करते हैं। यह परंपरा आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का भी सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।

हालांकि समय के साथ इस सदियों पुरानी परंपरा को निभाने वाले लोगों की संख्या अब कम होती जा रही है, लेकिन जहां-जहां यह परंपरा आज भी जीवित है, वहां सुबह का माहौल बेहद भक्तिमय और उल्लासपूर्ण रहता है। ढोलक-मंजीरे की गूंज के बीच गाए जाने वाले भजन लोगों को पुराने जमाने की याद दिला देते हैं, जब गांवों में भक्ति, सादगी और अपनापन जीवन का हिस्सा हुआ करता था।


माघ माह में चलने वाली यह कीर्तन परंपरा आज भी लोगों के दिलों में आस्था, श्रद्धा और संस्कारों की लौ जलाए हुए है, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है।
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