5:16 pm Wednesday , 5 August 2026
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सावन का महीना और यादों की बारात

बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
सावन का महीना है तो 50 से 70 के दशक के बीच धरती पर आगमन करने वालों को पुरानी यादों की बारात का याद आना उतना ही जरूरी ह ैजितना मीठी नींद में मनभावन सपनों का आना जरूरी है। सच तो यह इस अवधि में जन्म लेने वालों ने समाज, प्रकृति, विज्ञान और बदलाव का जो दौर देखा वह ना तो पचास के दशक से पूर्व किसी ने देखा होगा और ना आज की पीडी उसको देख पाएगी। बदायूं के कछला का वह सडक और रेलमार्ग का इकलौता पुल, नगला मंदिर पर लगने वाला तीज का मेला, सोत नदी किनारें लगने वाला भुजरियों का मेला, शहर की गलियों को रोशन करने वाली दीवारों पर लगी लालटेन, रिक्शा में लगने वाली छोटी सी लालटेन, बदायूं उझानी तक चलने वाले वह गणेश टैम्पों, रामलीला मैदान में दरी बिछा कर परिवार के बैठने का स्थान घेरना, लकडी के झूले, पांडु रंग पटेल की सत्तर फिट उची सीडी से लगाई जाने वाली मौत की छलांग अब बीते कल की बात हो गई है। छुक – छुक कर के चलने वाला रेल का कोयले वाला इंजन बीती यादों का का सफर बनकर रह गया सा लगता है। किसी वैवाहिक समारोह में परिजनों का एक दरी पर बैठकर सब्जी काटना, आटा गूधना और कारीगर के उपर फूफा की चौकीदारी, जनमासे में मौसा की व्यवस्थाएं, बारात में बिरादरी के बर्तन, बिस्तर और चारपाई आने की बात आज कौन सोच सकता है। बारात की अगवानी में नाना, दादा की अहमियत कौन भूल सकता है। नानी और दादी के वह घरेलू नुख्श ेअब किताबों में ही मिलते है और इन साब बातो से दूर हटके निगाह डाली जाये तो इस दौर धरती पर अवतरण लेने वाली पीडी ने अपने माता, पिता से जो बडों का सम्मान करने का जो संस्कार सीखा वह मोबाइल युग में कहानी और किस्सों में दिखाई देती है।

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