दिल्ली वाली रेल का खेल- पब्लिक है जो सब जानती है ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
दिल्ली वाली रेल के खेल ने कुछ ऐसा रंग दिखाया है जिसे देखकर लोकतंत्र का चांद भी शरमाया है। इस कहानी के दो पात्र हैं जिनके आरोप – प्रत्यारोप दिल्ली वाली रेल के खेल के उपरांत आम आदमी के बीच चर्चा का केंद्रविंदु बन गए हैं इनमें एक बीएल वर्मा है जो नितान्त सरल स्वभाव के हैं और वर्तमान केंद्रीय मंत्री मंडल में मंत्री हैं और बदायूं के उपनगर उझानी के निवासी हैं जबकि दूसरे बदायूं के सांसद आदित्य यादव हैं जो सपा के संस्थापक धरती पुत्र मुलायम सिंह यादब के भाई शिव पाल सिंह यादव के पुत्र हैं जो बदायूं के विकास हेतु संसद में निरंतर प्रयासरत रहते हैं। बात संसद शुरू हुई जहां सांसद आदित्य यादव द्वारा बदायूं से दिल्ली वाली रेल चलाने की मामला उठाया और उसके उपरांत वर्तमान में आजमगढ के सपा सांसद जो बदायूं के पूर्व सांसद रहे और बदायूं में अपने विकास कार्यो मेडीकल कालिज, बाइपास, ओवरब्रिज निर्माण के चलते प्रथक पहचान रखते हैं वह दिल्ली वाली रल को लेकर उस समय चर्चा में आ गए जब उन्होंने सदन में बदायूं में कोई विकास कार्य ना कराने की बात कहते हुए इसके लिए मंत्री को जिम्मेदार होने की बात कह दी और वहीं से दिल्ली वाली रेल को लेकर राजनीति का खेल शुरू हो गया और दिल्ली वाली रेल शुरू हो गई जिससे बदायूं वालों की 78 साल से चल रही दिल्ली वाली रेल की मांग पूरी हो गई।
रेल तो चल गई लेकिन रेल के खेल ने इस दौरान होने वाली राजनेतिक ब्यानबाजी ने दोनों पक्षों की ओर से राजनेतिक प्रहार शुरू हो गए। एक पक्ष का कहना था कि मुंह दिखाने लायक नहीं हैं तो दूसरे ने लोकप्रियता पर प्रश्न चिंह लगाकर आंकलन करने हेतु चुनाव मैदान में उतरने की चुनौती दे दी। हो सकता है कि राजनीति को लेकर दोनों पक्षों को अपनी बात सही लगती हो लेकिन सत्यता दोनों की अलग है। श्री वर्मा अच्छे वक्ता और व्यवहार कुशल ह ैपरं केंद्रीय मंत्रीमंडल में उनकी एंट्री राज्यसभा सांसद के रास्ते हुई है वह जनता के बीच से चुनाव जीतकर नहीं गए हैं जबकि सांसद आदित्य यादव बदायूं संसदीय सीट से चुनाव जीत कर सांसद बने हैं यह बात सत्य है कि वह भी मिलनसार और व्यवहार कुशल हैं लेकिन श्री यादव को ष्ह सोचना चाहिए कि बदायूं की राजनीति में उनकी किस रास्ते से हुई है। अगर यह सत्य है कि बदायूं में विकास सपा सासंद धर्मेंद्र यादव ने कराया तो उनको यह नहीं भूलना चाहिए कि बदायूं में बीस साल कोई कार्य ना कराने के आरोपों से घिरे सांसद सलीम इकबाल शेरवानी समाजवादी पार्टी के ही थे और धर्मेंद्र यादव को बदायूं से दूर करने वाले वह लोग सपा के ही थे।
कौन किस कार्य का कितना श्रेय लेता है और ले रहा है इस तलवार को मैदान में निकालने की जगह म्यान में रहने दीजिये और राजनेतिक महाभारत की जगह राजनेतिक संघर्ष से विकास की राह बनाने का काम कीजिये क्योंकि यह जो पब्लिक है ़़़़वह सब जानती है।
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