यह कैसा इंसाफ जो रेवडियां फिर अपनों को ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बदायूं से दिल्ली तक चलने वाली रेल को दिलाना केन्दीय मंत्री बीएल वर्मा की एक बडी उपलब्धि है यह बात आठ दशक से रेल की प्रतीक्षा कर रहे बदायूं वाले मान रहे हैं और भाजपा सरकार से बदायूं वालों को यही उम्मीद थी। बदायूं वालों को लगता है कि आजादी के आठ दशक में सात दशक तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस और अन्य सरकारों ने रेल चलने का सपना दिखाने के आश्वासन के सिवा इस मामले को कुछ नहीं किया लेकिन यह कटु सत्य है कि दिल्ली वाली रेल चलवाने के पीछे कुछ ऐसे समाजिक संगठन और मीडिया से जुडे लोगों का भी हाथ रहा जिन्होंने रेल का खेल ठंडे बस्तें में नहीं जाने दिया। रेलवे ने कभी सत्ताधारियों के दबाव में सर्वे तो कभी लोको की आवश्यकता के नाम पर मामले को अटकाया लेकिन अन्ततः जीत बदायूं वालों के धैर्य की हुई जिन्होनंे शांत मन से समय का इंतजार किया। अब आज केद्र में सत्ता भाजपा की है और बदायूं की सत्ता श्री वर्मा के हाथों में है तो इसका राजनेतिक लाभ श्री वर्मा को ही मिल रहा है और मिलना भी चाहिए इसमें कोई बुराई नहीं है परंतु श्री वर्मा को एक बात पर खुलेेमन से विचार अवश्य करना चाहिए कि क्या रेल शुरू होने के उदघाटन समारोह हेतु व्यय की जाने वाली धनराशि का उपयोग उचित हो रहा है क्योंकि आम आदमी को लग रहा है कि विज्ञापन राशि का भुगतान उन प्रभावशाली लोगों को जा रहा है जिन्होंने दिल्ली वाली रेल के खेल मे ंहमेशा रेल चलवाने से ज्यादा रेल को मुददा बनाने और अटकाने की राह बनाये रखी क्योंकि सारी रेवडियां उन्ही हाथों में गई हैं।


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