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बदांयू 7 नवंबर।
रूहेलखंड का मिनी कुंभ मेला ककोडा में कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान मेला युवाओं के लिए पिकनिक स्पॉट बन गया है। गंगा की रेती पर युवा तैराकी और रेत के खेल का आनंद ले रहे हैं, जबकि महिलाएं और बुजुर्ग पूजा-पाठ में व्यस्त हैं। कुछ युवा ट्रैक्टर-ट्रॉली पर गाने बजाकर घूम रहे हैं। मेले में मुंडन संस्कार भी हो रहे हैं, जिससे आस्था और मनोरंजन का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।
गंगा की रेती पर 12 दिन के लिए बसे तंबुओं के अस्थाई शहर में युवा गंगा की रेती में अठखेलियां कर रहे है। युवाओं द्वारा गंगा में तैराकी का भी खूब लुत्फ उठाया ,तो नन्हें-मुन्ने रेत से घर-मंदिर आदि बनाने में लगे हुए है।
वहीं, कुछ युवा तो राजनीति पार्टियों के झंडे लगाकर ट्रैक्टर-ट्रॉली पर साउंड बजाकर मेले का भ्रमण कर रहे हैं। महिलाएं भी गानों की धुन पर खूब धमकती नजर आ रही है
कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा किनारे लगने वाले मेेले में हर साल से कुछ नयापन दिखाई देने लगा है। क्योंकि मेले में युवा वर्ग अधिक आने लगा है। मेला पिकनिक का रूप लेता जा रहा है। इस बार भी गंगा की रेती का नजारा कुछ अलग है। आस्था तो सिरमौर है ही, साथ ही रेत के मैदान पर मस्ती के नजारे भी देखने को मिल रहे है।
बारह दिन तक बसने वाली तंबुओं की नगरी में महिलाएं और बुजुर्ग पूजा-पाठ में तल्लीन हो रहे। भोर में गंगा स्नान से लेकर शाम तक प्रभु का स्मरण किया जा रहा। साधु-संत कल्पवास में व्यस्त हैं।
वहीं, युवा मौज-मस्ती में वक्त बिता रहे। पानी में खड़े होकर मीनार बनाना, कलाबाजी करना, तैराकी रेस और पानी के बीच उछल-कूद करना युवाओं की दिनचर्या में शुमार हो गया। क्रिकेट कुश्ती, बैडमिंटन से लेकर रेत के मैदान पर खूब मस्ती खेली जा रही है। नन्हें-मुन्ने रेत के टीले, मंदिर और घर बनाने में व्यस्त दिखाई पड़ रहे हैं
मेला ककोडा आऐ लोगों का कहना है कि कुछ डेरों में तो ट्रैक्टर, डीजे पर मनोरंजन का आनंद ले रहे हैं , कहीं-कहीं ढोलक की थापें सुधाई दे रही है। अबकी बार गंगा मेले ने 40 साल बाद अपनी जगह का रूप लिया है। गंगा किनारे लगा मेला दिन प्रतिदिन अपने रंग बदल रहा है।
मेले में मान्यता है कि अपने नवजात शिशुओं का मुंडन कराने आई महिलाएं अपने स्वजनों के साथ अपने सर पर कलश रख ढोल और बैंड बाजे के साथ गंगा तट पर जाती हैं और रीति रिवाज के साथ अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराया जाता है। मेले के अवसर पर सैकड़ों बच्चों का मुंडन संस्कार भी हुआ। हें ना मेला ककोडा के रंग हजार।
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