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उझानी-बोर्ड पर बड़े-बड़े डॉक्टराें के नाम, मौके पर कोई नहीं ?


उझानी बदांयू 14 सितंबर।

निजी अस्पतालों की मनमानी पर शिकंजा कसने के लिए शासन ने पंजीकरण नियमों में बदलाव किया था। डॉक्टर किसी एक ही अस्पताल में ही फुल टाइम सेवा के लिए अपनी डिग्री लगा सकेंगे। ऑनकॉल की सेवा भी एक दिन एक ही जिले में दे पाएंगे। यह नए नियम लागू तो कर दिए गए, मगर इसके अनुपालन पर किसी का ध्यान नहीं है।

नतीजा जिले में ऐसे अस्पताल बड़ी संख्या में संचालित हैं, जिनके बोर्ड पर तो बड़े और नामी डॉक्टरों के नाम हैं, लेकिन मौके पर कोई नहीं होता।

स्वास्थ्य विभाग ने खुद पिछले एक माह में ऐसे तीन चार अस्पतालों को बंद कराया है। बावजूद जिले में अभी भी ऐसे अस्पताल 100 से भी ज्यादा की संख्या में संचालित हो रहे हैं।

बदहाल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के चलते निजी अस्पताल और नर्सिंग होम का दायरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इन अस्पतालों में मरीजों के शोषण और आए दिन होने वाली मौत की घटनाओं का संज्ञान लेते हुए शासन ने पिछले साल पंजीकरण नियमों को सख्त किया था। स्पष्ट किया था कि अस्पताल के पंजीकरण के वक्त ही वहां सेवा देने वाले डॉक्टर का पूर्ण विवरण देना होगा। इसमें डिग्री के साथ ही उसकी सेवाओं का भी उल्लेख होगा। एक डॉक्टर किसी एक ही अस्पताल में अपनी फुल टाइम सेवा के लिए डिग्री लगा सकेगा। ऑनकॉल विशेषज्ञों के लिए भी सख्ती की गई है। इनका भी एमसीआई नंबर पोर्टल पर डालकर पता किया जाएगा कि एक दिन में वह कितने अस्पताल और कितने जिले में सेवाएं दे रहे हैं।

दावा किया गया था कि ऑनकॉल के नाम पर एक डॉक्टर कई जिलों में हर दिन सेवा देने का फर्जीवाड़ा करते थे। इस पर भी नकेल कसेगी। नए बदलावों को लागू तो कर दिया गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका पालन नहीं हो रहा। एक ही डॉक्टर की डिग्री पर कई अस्पताल संचालित हो रहे हैं।

बरेली, अलीगढ़,आगरा जैसे बड़े शहरों में नियमित सेवा देने वाले डॉक्टरों की डिग्री पर भी यहां अस्पताल चल रहे हैं। जिले में भी उनके नाम पर ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल संचालित हैं। स्वास्थ्य विभाग इससे बेखबर बना हुआ है।

बिना सर्जन और एनेस्थेटिक हो रहे ऑपरेशन
नर्सिंग होम और अस्पतालों में सर्जरी के लिए सर्जन की तैनाती जरूरी है। एनेस्थेटिक भी अनिवार्य रूप से होना चाहिए। जिले में संचालित ज्यादातर अस्पतालों के पास खुद के सर्जन नहीं हैं। विभागीय अधिकारियों के पास यह जानने की फुर्सत भी नहीं है कि जब सर्जन नहीं हैं तो ऑपरेशन कौन कर रहा है। अस्पतालों में दूसरे जनपदों के डॉक्टरों के नाम और डिग्रियां लिखवा दी गई हैं, जिन डॉक्टरों के नाम अस्पतालों में लिखे हैं, उनमें से शायद ही कोई डॉक्टर निजी अस्पतालों में आता हो। यही हाल एनेस्थेटिक का भी है। एक ही एनेस्थेटिक अलग-अलग अस्पतालाें में पहुंचकर सेवा दे रहे हैं। पूर्व में हुई जांच में इसकी पुष्टि के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

जिले में कुल 16 सीएचसी संचालित हैं। सीएचसी स्तर के दो ब्लॉक पीएचसी भी संचालित हो रहे हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में 15 से अधिक सर्जन, स्त्री रोग विशेषज्ञ के 12 और हड्डी रोग विशेषज्ञों के करीब दस पद रिक्त हैं।

ऐसे में सरकारी अस्पतालों को खोजे से विशेषज्ञ नहीं मिल रहे हैं, सर्जन भी नहीं हैं। बेहोशी के चिकित्सकों के भी 8 से अधिक पद रिक्त हैं। लेकिन कई निजी अस्पताल संचालक अपने यहां सर्जन होने और हर प्रकार के ऑपरेशन की सुविधा होने का दावा कर प्रचार करते हैं।

वर्षों से चल रहे थे अस्पताल, जांच हुई तो नहीं मिले डॉक्टर
पिछले दो माह में ही स्वास्थ्य विभाग ने 10 से अधिक अस्पतालों पर कार्रवाई की है। यह अस्पताल लंबे समय से संचालित थे। शिकायत पर जांच हुई तो उनके पास कोई रिकॉर्ड ही नहीं था। नोडल अधिकारी की टीम ने पिछले माह बिल्सी, दातागंज, उझानी, बजीरगंज, बदांयू मे संचालित कई अस्पतालों को बिना रजिस्ट्रेशन के पाए जाने पर बंद कराया था। मगर कुछ दिनों बाद अस्पताल व नर्सिंग होम फिर से खुलने लगे।

शीघ्र ही विशेष अभियान चलाकर बिना डॉक्टर संचालित अस्पतालों को बंद कराया जाएगा। ऑपरेशन थियेटर के भी मानकों की निगरानी की व्यवस्था की जा रही है। – डॉ. रामेश्वर मिश्रा, सीएमओ।

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