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पितृपक्ष पखवाड़े में तर्पण से होगा पितरों का तारण

बदांयू 10 सितंबर।

श्राद्ध पर्व शुरू हो चुके हैं, यह पूर्वजों की पुण्य स्मृति का पर्व है, उनकी विरासत को संजोने के संकल्प का पर्व। नई पीढ़ी में पूर्वजों के प्रति आस्था को जगाने के लिए श्राद्ध आदि कर्म किऐ जाते हैं। पितरों की तृप्ति के लिए पिंडदान भी जरूरी बताऐ जाते हैं।

आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से पूर्वजों की स्तुति का पर्व पितृपक्ष प्रारम्भ हो चुका है । जिसमें पूर्वजों की प्रसन्नता एवं आत्माशांति के लिए पिंडदान एवं श्राद्ध होने लगे हैं। पितृपक्ष की औपचारिक शुरुआत पूर्णिमा से होती है, शास्त्रों में इसे ‘महालयारम्भ’ कहा गया है। पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य का यह सिलसिला 21 सितम्बर, सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा, इसमें साधक स्वयं की सुख-शांति व पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान, तिल दान, जल आदि अर्पण कर पितरों का पूजन करते हैं।

पितृपक्ष में जिस तिथि में पूर्वजों का निधन होता है उसी तिथि पर पिंडदान किया जाता है।

क्यों आवश्यक है पिंडदान- पिंड का अर्थ किसी वस्तु का गोलाकार रूप है। प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा जाता है। मृतक कर्म के संदर्भ में ये दोनों ही अर्थ संगत हो जाते हैं। पिंडदान न करने वालों को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, संतान आदि का कष्ट प्राप्त होता है।

ये काम जरूर करें
ब्राहमण भोजन से पहले गाय, कुत्ते, कोआ, देवता व चींटी के लिए भोजन सामग्री निकालें।
दक्षिणाभिमुख होकर कुश, तिल और जल लेकर गो, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, अनाज, गुड़, चांदी, नमक आदि का दान काफी पुण्यकारी होता है। श्राद्ध में दूध, गंगाजल, मधु, वस्त्र, कुश, तिल, तुलसीदल के साथ पिंडदान करना चाहिए।

पितृपक्ष में कुछ बंदिशें भी होती हैं जिसका पालन करना आवश्यक होता है। श्राद्ध तिथि वाले दिन तेल लगाने, दूसरे का अन्न खाने, स्त्री प्रसंग से परहेज करें। श्राद्ध में राजमा, मसूर, अरहर, गाजर, गोल लौकी, बैंगन, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला नमक, काला जीरा, सिंघाड़ा, जामुन, महुआ, चना का उपयोग नहीं करना चाहिए।

पितृपक्ष पितरों के संस्मरणों के पुनः स्मरण और संस्कारों के अनुपालन-अनुशीलन का पर्व है, इसलिए श्रद्धापूर्वक पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को नमन कर उनके आशीष से सुख-समृद्धि के वरदान को प्राप्त करें।

प्रदीप प्रजापति

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