भाग दौड़ भरी जिंदगी और रुपए की चकाचौंध ने अपनों को अपनों से किया दूर
वजीरगंज से अनुराग मिश्रा की खास रिपोर्ट
वक्त ने करवट क्या बदली कि इंसानों ने भी अपनी मानसिकता बदल ली कभी नातेदार और रिश्तेदारों के द्वारा घर परिवार गुलजार रहता था और रिश्ते नाते हमेशा बने रहते अगर कोई नाते रिश्तेदार काफी समय तक घर नहीं आता था तो दूसरा रिश्तेदार उसे घमंडी और बड़ा व्यक्ति बताने से भी नहीं संकोच करते थे घर आए मेहमान का स्वागत कभी लोग ऐसे करते थे जैसे मानो यह घर उनका है इसी प्यार और अपनत्व की वजह से लोग दो-चार दिन नहीं हफ्तों भर रिश्तेदारी में रहने से भी परहेज़ नहीं करते थे लेकिन समय ने इंसान को इतनी जल्दी बदल दिया कि उसे भी उम्मीद नहीं थी कि इंसान इतना बदल जाएगा जो दूसरे के साथ सुख दुख
को भी भूल जाएगा आज वही वक्त है कि संयुक्त परिवार धीरे-धीरे बिखेर चुके हैं कुछ ईका दुका परिवार ही बचे हैं जो एक ही छत के नीचे रहकर मौज-मस्ती के साथ जीवन यापन कर रहे हैं वरना आज की इस चकाचौंध भरी दुनिया में लोग अपनों के बीच रहकर अपने आप को ही खोते जा रहे हैं आज के दौर में लोग अपने आप को सुकून भरी जिंदगी जीने की चाहत में अपने ही बच्चों का जहां बचपन छीन ने के साथ-साथ अपना बुढ़ापा भी खराब कर रहे हैं लोगों ने आज सुकून छोड़कर पैसे को ही अपना सब कुछ मान लिया है यही कारण है कि जब बच्चा पैदा होने के बाद वह रोना सीखना है तो मां-बाप उसके हाथ में कार्टून भरा मोबाइल थमा कर खुद को राहत भरी सांस लेकर बेफिक्री के साथ नौकरी और बिजनेस करने में मशगूल रहते हैं लेकिन कुछ दंपति अपने मासूम बच्चों को एक साल की उम्र में पिले School और दूसरे के सारे छोड़कर जहां बच्चों को ममता पिता और संस्कारों से दूर कर देते हैं लेकिन ऐसे मां-बाप रुपया तो बहुत कमाते हैं लेकिन वह अपने बुढ़ापे का सहारा खो देते इसी का ही उदाहरण है कि बच्चे बड़े होकर मां-बाप से दूर रहकर हॉस्टलों में पढ़ते हैं और बचपन में ना तो उन्हें मां का प्यार मिला और ना ही बाप के संस्कार बचपन में बच्चा जहां मां की गोद में प्यार के साथ-साथ संस्कारों का भी निर्वाह करना सीखना है वही पिता की छत्रछाया में रहकर मान मर्यादा के साथ-साथ त्याग और अतिथि देवो भव का भी निर्वाह करता है लेकिन आज के दौर में बच्चे पढ़ लिखकर विदेश भाग जाते हैं या किसी दूसरे शहर में अपने बच्चों के साथ शिफ्ट हो जाते हैं जब उनके मां-बाप बुढ़ापे के दौर में पहुंचते हैं तो वह उन्हें अकेला छोड़ देते हैं जो समर्थ वान होते हैं वह वृद्धाश्रय में पहुंच जाते हैं और जो अपनी सारी पूंजी खर्च कर संपत्ति बेचकर बच्चों को पढ़ा लिखा कर बड़ा बनाते हैं वह किसी दूसरे की दया पर अपना जीवन जीने को मजबूर रहते हैं अगर आपको बुढ़ापे में बच्चों के कंधों पर शमशान भूमि जाना है तो बच्चों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार और मां-बाप का साथ भी मिलना बहुत जरूरी है
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