उझानी बदांयू 18 जुलाई।
जैसे-जैसे महाशिवरात्रि का पर्व नजदीक आता जा रहा है, जिले भर में कांवड़ यात्रा की रौनक और श्रद्धा दोनों बढ़ती जा रही हैं। कछला गंगा घाट से बड़ी संख्या में शिवभक्त विभिन्न प्रकार की कांवड़ लेकर गोला गोकर्णनाथ , पीलीभीत, पूरनपुर, बरेली, टनकपुर शाहजहांपुर,की ओर रवाना हो रहे हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चित और कठिन मानी जाने वाली खड़ी कांवड़ के साथ-साथ झूला कांवड़, बैकुंठी कांवड़ और डाक कांवड़ भी शामिल हैं।
शिवभक्तों की टोली बोल बम के जयघोष के साथ दिन-रात कछला से गंगाजल लेकर निकल रही है । टोली में शामिल गोला गोकर्णनाथ के पंडित सुभाष चंद्र बताते हैं कि कांवड़ यात्रा सिर्फ शरीर की नहीं, आस्था और संयम की भी परीक्षा है।
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-डाक कांवड़-
इस कांवड़ को शिवभक्त तेज गति से पैदल या दौड़ते हुए लाते हैं। जल को बोतल में रखकर बिना रुके यात्रा की जाती है। इसे यात्रा के दौरान न तो जमीन पर रखा जाता है और न ही कोई ठहराव होता है। डाक कांवड़ में अनुशासन, संयम और समयबद्धता अत्यंत आवश्यक होती है।
-खड़ी कांवड़-
यह सबसे कठिन कांवड़ मानी जाती है। इसे यात्रा के दौरान कभी भी जमीन पर नहीं रखा जाता। यदि यात्री थक कर विश्राम करता है, तो कोई दूसरा स्वच्छ व्यक्ति कांवड़ को कंधे पर लेकर खड़ा रहता है। इसमें शारीरिक और मानसिक ताकत की विशेष आवश्यकता होती है।
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-झूला कांवड़-
इसमें भी कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता, बल्कि विश्राम के दौरान बांस या पाइप से बने झूले पर टांगा जाता है। यह कांवड़ दिल्ली से मेरठ मार्ग ज्यादा देखने को मिलती है ,बड़ी संख्या में श्रद्धालु इसी पद्धति से जल लेकर जाते हैं।
—————– -बैकुंठी कांवड़-
इस कांवड़ में गंगाजल को टोकरी में रखा जाता है, जिसे एक डंडे के दोनों ओर लटकाया जाता है। इसमें एक स्टैंड भी होता है, जिससे इसे कहीं भी स्वच्छ स्थान पर रखा जा सकता है। इस यात्रा की अवधि निश्चित नहीं होती, पर जलाभिषेक महाशिवरात्रि तक अनिवार्य होता है।
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राजेश वार्ष्णेय एमके।





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