4:58 pm Tuesday , 21 July 2026
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बिजली घर परियोजना ठप होने पर उबाल: बदायूं के किसानों ने दी 2027 चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

बिजली घर परियोजना ठप होने पर उबाल: बदायूं के किसानों ने दी 2027 चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

बदायूं/बिसौली: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे को लेकर बढ़ते असंतोष के बीच बदायूं जिले के ललुआ नगला क्षेत्र में बिजली घर निर्माण का मामला अब राजनीतिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। प्रस्तावित बिजली घर का निर्माण कार्य शुरू न होने से नाराज़ किसानों और ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों के खिलाफ खुला मोर्चा खोल दिया है।
भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के तहसील अध्यक्ष मुकेश भदौरिया के नेतृत्व में ग्रामीणों ने पूर्व विधायक को एक विस्तृत “रोष-पत्र” सौंपते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया गया, तो वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव का सामूहिक बहिष्कार किया जाएगा।
ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान क्षेत्र के किसानों ने बिजली संकट और कमजोर विद्युत व्यवस्था के विरोध में मतदान बहिष्कार का मन बना लिया था। उस समय स्थानीय जनप्रतिनिधियों द्वारा ललुआ नगला में बिजली घर निर्माण का आश्वासन दिया गया, जिसके बाद ग्रामीणों ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लिया।
हालांकि, हाल ही में परियोजना के प्रस्ताव के खारिज होने की सूचना सामने आने के बाद ग्रामीणों में गहरा असंतोष फैल गया है। किसानों का कहना है कि वर्षों से क्षेत्र के लोग खराब बिजली आपूर्ति, लो-वोल्टेज और लगातार कटौती की समस्या झेल रहे हैं, लेकिन चुनावी वादों के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
किसान नेताओं और ग्रामीणों ने संयुक्त रूप से निर्णय लिया है कि जब तक बिजली घर निर्माण कार्य ज़मीन पर शुरू नहीं होता, तब तक क्षेत्र के दर्जनों गांवों में किसी भी राजनीतिक दल या जनप्रतिनिधि को चुनाव प्रचार की अनुमति नहीं दी जाएगी।
इस विरोध में शामिल प्रमुख गांवों में भरतपुर, करेंगी, मुसियनगला, दौलतपुर, मोतीपुरा, विधाननगला, ललुआ नगला, आदपुर, ततारपुर, पपगांव, दबतोरी, लक्ष्मीपुर बिजौरी, करलावाला और संग्रामपुर शामिल हैं।
रोष-पत्र पर मुकेश भदौरिया के अलावा सुशील कुमार, दीवान सिंह, हरीश चंद्र, सतेन्द्र सिंह, मुकेश Kumar, अजयपाल सिंह और उमेश पाल सहित अनेक ग्रामीणों और किसान प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर दर्ज हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि अब वे केवल आश्वासनों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं और इस बार आंदोलन को निर्णायक मोड़ तक ले जाया जाएगा। क्षेत्र में बढ़ता यह असंतोष आगामी चुनावी समीकरणों पर भी असर डाल सकता है, खासकर ऐसे समय में जब ग्रामीण बुनियादी सुविधाएं राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय मुद्दा बनती जा रही हैं।

केशव गुप्ता

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