चाय: एक प्याले में सिमटा हुआ साहित्य, रिश्तों की ऊष्मा और यादों का कारवां।
बदायूं 21 मई ।
जब अल्फाज़ रूठ जाएं, जब ख़ामोशी शोर करने लगे, तब एक कप चाय ही वह पुल बनती है जो दो दिलों को फिर से जोड़ देती है। आज अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस है- उस अमृत का दिन, जो न केवल तन की थकान हरता है, बल्कि मन के कलुष को भी धो देता है।
सिर के दर्द से बोझिल दोपहर हो या मन की उदासी से भीगी शाम, जब शब्द कम पड़ जाएं और मन का आकाश बादलों से घिर जाए, तब याद आती है बस वही- सौंधी महक वाली चाय। क्योंकि जब जीवन की डोर उलझ जाए, तो हमसफ़र और चाय के सिवा कोई दूसरा किनारा नहीं मिलता। एक चुस्की और सारी गिरहें खुलने लगती हैं।
चाय केवल शरीर को ही ऊष्मा नहीं देती, वह रिश्तों की जमी हुई बर्फ़ को भी पिघलाकर उसमें नई प्राण-ऊर्जा भर देती है। नुक्कड़ की टपरी से लेकर पंचसितारा होटल तक, हर जगह चाय वह साझा भाषा है जिसमें शिकायतें माफ़ीनामे में और अनबनें आलिंगन में बदल जाती हैं। यहाँ सौदे तय होते हैं, दोस्तियाँ जन्म लेती हैं और बिछड़े हुए लोग फिर मिल जाते हैं।
गुनगुनी धूप में लिपटी सर्द सुबह हो या रात के सन्नाटे को चीरता लंबा सफ़र, राजमार्ग के किनारे जलती भट्टी पर खौलती केतली और कुल्हड़ में छलकती अदरक-इलायची वाली चाय… यह वह अनुभव है जिसे कागज़ पर उतारना शब्दों के बस की बात नहीं। यह तो बस महसूस किया जाने वाला वह क्षण है जो आत्मा तक उतर जाता है।
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अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस पर ख़ास- राजेश वार्ष्णेय एमके।




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