विद्यार्थियों की किताबों से दूरी, मोबाइल ने छीना पढ़ने का तरीक़ा।
नज़रिया – राजेश वार्ष्णेय एमके।
उझानी-बदांयू 23 अप्रैल।
शिक्षा के शहर में पढ़ाई का तरीका बदल रहा है। किताबों से दूरी, मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता और सस्ती फोटोकॉपी,व लाइब्रेरी का फैलता नेटवर्क शिक्षा की नई हकीकत बता रहे है।
शहर का विद्यार्थी अब मोबाइल स्क्रीन की चमक में सिमटता नजर आ रहा है। युवा अब किताबों के पन्ने पलटने के बजाय स्क्रीन स्क्रॉल कर रहा है। हालांकि, कुछ कालेज की लाइब्रेरी में अब भी विद्यार्थियों के हाथों में किताबें नजर आ रही हैं।
किताबों की दुकानों पर पहले जैसी भीड़ अब नहीं दिखती। नियमित पाठकों की संख्या सीमित रह गई है और अधिकतर छात्र परीक्षा के समय ही किताबों का सहारा लेते हैं। इसके उलट, युवा घंटों लाईब्रेरी में बैठकर मोबाइल पर रील्स और सोशल मीडिया में व्यस्त हैं। खाली समय में किताब पढ़ने के बजाय स्क्रीन स्क्रॉल करना नई आदत बन गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या शहर में पढ़ने की संस्कृति धीरे-धीरे खत्म हो रही है या सिर्फ उसका रूप बदल रहा है ?
पहले छात्र सुबह चार बजे उठकर किताबें खोलकर पढाई में लग जाता था। मगर अब ऐसा नहीं शहर में जगह-जगह शोरगुल से दूर एसी लाईब्रेरी खुल गई है अब छात्र हो या छात्रा घर छोड़कर लाईब्रेरी में मोबाइल पर गूगल बाबा की मदद से पढ़ना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं। इंटरनेट के युग में युवाओं ने भी अपनी पढ़ाई का चलन बदल लिया है, कहां किताबें खोलना सेकेंड में गूगल बाबा मोबाइल पर सब दिखा देते हैं। अब यह तो आने वाला वक्त बताएगा कि किताबों से पढ़ने का तरीका सही था या समय के साथ इंटरनेट द्वारा मोबाइल का ?।


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