कहां जा रही पत्रकारिता और क्यों हो रही चाटुकारिता ?
बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बात 1978 की है जब मैने पत्रकारिता शुरू की उस समय पं परमेश्वरी सहाय शंखधार, कन्हैंया लाल शर्मा, प्रकाश दीक्षित निर्मोही, मनोहर लाल बजाज, एसपी सिंहा उर्फ बडे दददा, एसपी सिंहा उर्फ छोटे दददा, इब्ने बख्शी, अब्दुल मजीद शांदा, निजामी साहब, प निहाल चंद्र शर्मा आदि की कलम बोलती थी उस समय दिग्गज और वर्तमान के पुरोधा मुन्ना बाबू शर्मा, उमेश शर्मा, आफाक हुसैन, अशोक सक्सेना आदि पत्रकारिता में सक्रिय थे इन सबके समाचार पत्र अलग थे सहित तमाम साथी एक साथ मिल कर काम किया करते थे। पत्रकारों के बीच आपसी सम्मान देना एक परम्परा थी और उसका उदाहरण पत्रकारिता में सूरज प्रसाद, विष्णु देव चाणक्य और मुझे पदार्पण कराने वाले नत्थू लाल गुप्ता को वह सम्मान हासिल था जो एक गुरू का होता है। किसी समारोह पत्रकारवार्ता में अपने से वरिष्ठ के आने पर किसी छात्र की तरह खडा होना उस समय की विषेशता नजर आती थी जबकि वर्तमान में एक – दूसरे को नीचा दिखाने की ऐसी प्रतियोगिता दिखाई दती है तो दिल दुखता है। वैसे मुझे इन हालातों से कोई गुरेज नहीं क्योंकि वह दौर प्रिन्ट मीडिया का था जिसमें पत्रकारों की संख्या सीमित थी उसके बाद इलेक्ट्रिोनक मीडिया का दौर देखा जहां पत्रकारों की संख्या में बृद्धि हुई और वर्तमान दौर में यूटयूबर और फेसबुकी पत्रकारिता को देखने का वह दौर देखने को मिल रहा है जिसमें कोई किसी के साथ मिलकर काम करने को तैयार नहीं दिखता और अपनी ढपली अपना राग वाले हालात बनते जा रहे हैं जिसकी संख्या में पत्रकारिता की राह चाटुकारिता के गलियारे में अपनी धूम मचा रही है और इस हालात में समझौता करना हर एक के बस की बात नहीं बस यही लगता है कि वर्तमान में सक्रिय उस समय के पत्रकारों की शायद ट्रेनिग गलत हो गई।
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