8:43 pm Monday , 20 July 2026
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वजीरगंज – राजनेतिक उपेक्षा और जाम की कहानी जो याद दिला देती है नानी

वजीरगंज में जाम की कहानी जो याद दिला देती है नानी
वजीरगंज। जनपद में राजनेतिक रूप से दिखने वाली सबसे प्रमुख जागरूक बस्ती पर निगाह डाले तो ऐसा लगता है कि आजादी के बाद से वजीरगंज के नागरिकों का वोट बैंक की तरह जमकर उपयोग हुआ है लेकिन विकास के मामले को लेकर क्षेत्र के राजनेतिकों ने वजीरगंज को बिल्कुल तरजीह नहीं दी। आजादी के बाद इस क्षेत्र पर निकटवर्ती कस्बा सैदपुर के रहने वाले एक परिवार का राजनेतिक कब्जा रहा जिसके चलते कांग्रेस शासन में वजीरगंज निरन्तर उपेक्षा का शिकार रहा। हालत यह रही कि जनसंघ का दीपक वजीरगंज में कभी चमका ही नहीं। जनता पार्टी के शासन में इस क्षेत्र को सम्माति करके बनने वाली बिनावर विधानसभा सीट से कांग्रेस विरोधी उम्मीदवार अली असगर उर्फ मल्लन मियां चुनाव जीते परंतु उनके सादगी पूर्ण जीवन के चलते बिनावर क्षेत्र उपेक्षा की चक्की में पिसता रहा तो वजीरगंज की हालत गेंहू के साथ पिसने वाले घुन जैसी बनी रही। 1990 में भारतीय जनता पार्टी के राम सेवक सिंह पटेल ने क्षेत्र में काम तो किए जिसमें वजीरगंज को उसके हिस्से के झंडे उठाने को तो मिले लेकिन विकास को लेकर वजीरंगज उतना महत्व नहीं मिल पाया जितना श्री पटेल को जिताने के वजीरगंज वालों ने झंडे उठाये थे। क्षेत्र के राजनेतिकों की उपेक्षा के चलते वजीरगंज में राजनेतिक जागरूकता मतलब परस्ती में डूब गई है और समाजिक जागरूकता में आगे दिखने वाले वजीरगंज के तमाम युवाओं की हालत कुंए के मेढक जैसी दिख रही है क्योंकि झंडे उचे कराने वाले एवं उठाने वालों को वजीरगंज में बाईपास की जरूरत नहीं दिख रही। अब तो लोग यह कहने लगे हैं कि काले चश्में के शौकीन राजनेताओं ने वजीरगंज का दर्द और विकास कभी दिखा ही नहीं।

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