कछला गंगा घाट बना ‘मौत का घाट’, हर हादसे के बाद जागता है कुंभकर्णी नींद सोया प्रशासन।
दशहरा पर हादसा- युवक की डूबने से मौत, युवती लापता।
उझानी-बदांयू 25 मई ।
दशहरा पर गंगा मैया के दर्शन करने आए हाथरस के कानू गांव के एक परिवार पर कहर टूट पड़ा। हसाइन थाना क्षेत्र के सर्वेश, ओमवीर, वर्षा के सामने ही 17 साल का नीलेश और 9 साल की शिखा सोमवार सुबह 8 बजे कछला भागीरथी गंगा घाट पर डूब गए।
गोताखोरों ने नीलेश की लाश तो निकाल दी, पर सिखा का अब तक सुराग नहीं। एक घर के दो चिराग बुझ गए, लेकिन प्रशासन के लिए यह सिर्फ एक और आंकड़ा है।
त्योहार पर भी ‘छुट्टी’ पर था प्रशासन, देखिए लापरवाही की 5 बड़ी तस्वीरें
डेंजर जोन’ खुला मैदान- कछला घाट का वो हिस्सा जहां हर साल 8 से 10 लोग डूबते हैं, वहां तक कोई बैरिकेडिंग नहीं। एक रस्सी तक नहीं बांधी गई। खतरे का एक भी बोर्ड नहीं लगाया गया। श्रद्धालु को क्या पता कि दो कदम आगे मौत खड़ी है।
गोताखोरों के भरोसे पूरा सिस्टम- पर्व के दिन 50 हजार से ज्यादा भीड़ थी और सुरक्षा के नाम पर 4 गोताखोर। उनके पास न मोटरबोट, न लाइफबोट, न वॉकी-टॉकी। सिर्फ एक बांस और अपनी जान। पुलिस वाले सेल्फी लेने और वीआईपी ड्यूटी में व्यस्त थे।
SDRF-NDRF सिर्फ नाम के- बड़े हादसों के लिए SDRF की टीम रिजर्व रहती है, पर कछला पर उसका कहीं अता पता नहीं था। शिखा को डूबे 4 घंटे हो गए, मगर अभी तक प्रोफेशनल टीम नहीं पहुंची। लोकल गोताखोर ही जाल डालकर टटोल रहे हैं।
‘बैठक-मीटिंग’ का ड्रामा-हर स्नान से 10 दिन पहले DM,ssp से लेकर SDM तक घाट का निरीक्षण करते हैं। फोटो खिंचवाते हैं। अखबारों में बयान देते हैं कि ‘सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हैं’। मगर पर्व वाले दिन न चेंजिंग रूम मिलते हैं, न पीने का पानी, न मेडिकल कैंप। इंतजाम सिर्फ VIP घाट पर दिखते हैं।
मौत के बाद मुआवजे का झुनझुना नीलेश की लाश निकलते ही तहसील से लेखपाल पहुंच गया। बोला ‘कागज तैयार करो, 4 लाख मुआवजा मिलेगा’। परिजन पूछ रहे हैं कि साहब, क्या 4 लाख से हमारा बेटा वापस आ जाएगा? क्या अगली बार किसी और का बच्चा नहीं डूबेगा इसकी गारंटी कौन लेगा?
सवाल जो प्रशासन से पूछे जाने चाहिए
हर साल करोड़ों का बजट स्नान पर्व के इंतजाम पर खर्च होता है। वो पैसा जाता कहां है? कछला घाट पर CCTV तक नहीं लगे। गहरे पानी में जाने से रोकने के लिए एक सिपाही तक तैनात नहीं किया गया। जब पता है कि दशहरा पर भीड़ उमड़ेगी तो आपातकालीन एम्बुलेंस, डॉक्टर, रेस्क्यू टीम पहले से क्यों नहीं तैनात की गई?
कानू गांव में मातम है और कलक्ट्रेट में सन्नाटा। यह हादसा नहीं, सीधे सीधे प्रशासनिक हत्या है। जब तक जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई नहीं होगी, कछला घाट पर लाशें गिरती रहेंगी और बयान आते रहेंगे।
राजेश वार्ष्णेय एमके।




badaunexpress.com badaunexpress.com | www.badaunexpress.com

