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करोड़ों की निधि पर कुंडली मारे बैठे नुमाइंदे, उझानी में ट्रांसफॉर्मर के लिए तरसी जनता

करोड़ों की निधि पर कुंडली मारे बैठे नुमाइंदे, उझानी में ट्रांसफॉर्मर के लिए तरसी जनता।

उझानी, 22 मई 2026।

उझानी की फिजाओं में इन दिनों बिजली नहीं, जनता का गुस्सा ‘हाई वोल्टेज’ पर है। जले हुए ट्रांसफॉर्मर और पल-पल की ट्रिपिंग ने लोगों का चैन-सुकून छीन लिया है। 45 डिग्री की आग उगलती गर्मी में जब पंखे भी जवाब दे जाएं, तो समझिए हालात कितने ‘शॉकिंग’ हैं। बच्चे बिलबिला रहे हैं, बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ रही है और कारोबारियों के इन्वर्टर भी अब हांफने लगे हैं।

रोज-रोज की ‘चिक-चिक’ से टूटा सब्र का बांध

यहां ट्रांसफॉर्मर का फुंकना अब मौसम की तरह पक्का हो गया है। कभी लोड बढ़ा तो कभी मेंटेनेंस फेल। नतीजा- पूरी-पूरी रात अंधेरे में कटती है। विभाग में शिकायत करो तो बस एक ही रटा-रटाया जवाब, “देख रहे हैं साहब”। जनता अब इस ‘इलेक्ट्रिक धोखे’ से आजिज आ चुकी है।

निधि से बिजली का काम कराने का पूरा नियम, फिर भी अंधेरा क्यों?

सबसे लाजवाब बात ये है कि इस ‘अंधेरगर्दी’ का इलाज नेताओं की तिजोरी में बंद पड़ा है। हर सांसद को सालाना 5 करोड़ MPLAD और विधायक को 5 करोड़ विधायक निधि मिलती है।

MPLADS और विधायक निधि के नियम साफ कहते हैं कि ये पैसा ‘स्थानीय क्षेत्र के विकास कार्यों’ के लिए है। इसमें सड़क, नाली, स्कूल, अस्पताल, पेयजल के साथ-साथ बिजली व्यवस्था सुधारना भी शामिल है। नियमों के तहत सांसद-विधायक अपनी निधि से नए ट्रांसफॉर्मर लगवा सकते हैं, हाई-टेंशन लाइन, खंभे, तार, स्ट्रीट लाइट और बिजली के दूसरे बुनियादी ढांचे पर खर्च कर सकते हैं।

निधि की तिजोरी भरी, जनता फिर भी अंधेरे में

मगर हकीकत ये है कि देशभर में ज्यादातर सांसद-विधायक अपनी पूरी निधि खर्च ही नहीं कर पाते। सरकारी आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि हर साल करोड़ों रुपये बिना खर्च हुए वापस लौट जाते हैं। एक ट्रांसफॉर्मर की कीमत मुश्किल से 10 से 15 लाख रुपये होती है। यानी निधि का एक छोटा सा हिस्सा भी उझानी की सालों पुरानी बीमारी ठीक कर सकता है।

‘जनता का पैसा, जनता के काम’ वरना किस काम?
स्थानीय लोग अब खुलकर पूछ रहे हैं – “जब नियम बिजली पर निधि खर्च करने की इजाजत देते हैं और निधि का पैसा खर्च न होने पर वापस चला ही जाता है, तो उससे दो ट्रांसफॉर्मर लगवाकर जनता को इस नारकीय जीवन से मुक्ति क्यों नहीं दिलाई जाती?”

अगर बदायूं के सांसद और बिल्सी विधायक चाहें तो कलम के एक स्ट्रोक से यहां ‘दूधिया रोशनी’ हो सकती है। इससे न सिर्फ जनता को रोज-रोज की चिक-चिक से निजात मिलेगी, बल्कि नेता जी का नाम भी घर-घर में ‘बिजली वाले बाबू’ के तौर पर अमर हो जाएगा।

अब फैसला जनप्रतिनिधियों के ‘स्विच बोर्ड’ में

सवाल सीधा है- क्या हमारे नुमाइंदे नियम का फायदा उठाकर अपनी निधि का ‘स्विच ऑन’ कर उझानी को रौशन करेंगे? या फिर करोड़ों की निधि हर साल की तरह बिना इस्तेमाल वापस लौट जाएगी और जनता यूं ही अंधेरे में पिसती रहेगी?

उझानी को अब भाषणों की ‘चमक’ नहीं, तारों में दौड़ते ‘करंट’ की जरूरत है। गेंद अब पूरी तरह सांसद-विधायक के पाले में है।

राजेश वार्ष्णेय एमके।

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