राजनीति में उल्टा चश्मा, कैसे बजे विकास का नगमा ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बदायूं की राजनीति का दु्रभाग्य यह है कि देश की आजादी से लेकर वर्तमान तक कुछ को छोडकर किसी ने सीधे चश्में से कुछ देखने की कोशिश नहीं की और जब से निधि युग आया है तब से काम पर कम और अपना दम बढाने का दायित्व को अक्सर अपनी तिजोरी को ध्यान में रखकर पूर्ण निष्ठा से निभाया गया है और जिसने काम करने की काशिश की उस पर बेगाने तो क्या अपनों ने योजनावृद्ध तरीके से बदायूं से भगाया गया है। यही कारण है कि जनपद में नगर पंचायत और नगर पालिका चुनाव के दौरान उसहैत, अलापुर, वजीरगंज, सहसवान, बिसौली, ककराला और बदायूं में अजब नजारा और गजब सहारा तमाम स्थानों पर देखने को मिला। संसदीय चुनाव के दौरान सपाईयों ने धर्मेंद्र यादव को बदायूं से दूर करने का नजारा दिखाया तो भाजपाईयों ने जीते हुए चुनाव की जडों में मठठा लगाने का वह उदाहरण दिखाया जो आज तक किसी के गले नहीं उतर रहा है। आवला सीट पर अपनों ने अपनों की नाव को डुबोकर दिखाया और यह हाल तब है कि विधानसभा चुनाव में बदायूं से जीतने वाले सपा विधायकों की जीत में सबसे अहम भूमिका में धर्मेद्र यादव, शिवपाल सिंह यादव, अखिलेश यादव का सहारा मिला तो भाजपा से जीतने वाले श्री मोदी और श्री योगी की लोकप्रियता के सहारे जीत के हकदार बने।


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