राजनीति का उसूल, काम निकालों जाओं भूल ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बात उस समय कि एक किसान ने अपनी संस्था बनाई और पूरी निष्ठा से सबके हित में काम किया और संस्था के चलने पर हर जिले में अपनी संस्था की शाखा खोलकर प्रभारी नियुक्त करने के साथ प्रभारियों को निष्ठा से काम करके अधिक से अधिक लोगों को संस्था से जोडकर मजबूती से काम करने को कहा तो कुछ ही दिनों में सस्था ने विराट रूप धारण कर लिया और क्षेत्र के तमाम गाव गलियारों तक संस्था के विकास और हर क्षेत्र में संस्था की अपनी पहुंच बन गई। संस्था से जुडे तमाम लोग अपनी मर्जी अपना राज की राह पर चल रहे थे संस्था भी मजबूत हो रही थी लेकिन इसी बीच कुछ ऐस हुआ कि देखभाल के अभाव में संस्था की हालत पतली होती चुली गई परंतु कुछ समय उपरांत आने वाले अच्छे दिन के सपने लेकर आने लगे और मुख्य प्रभारी को लगने लगा कि संस्था के नाम पर कुछ लोग गडबडझाला करते हैं सामने तो हमारे दिखते हैं पर विरोधियों से साठगांठ रखते हैं। बस फिर उन्होंने ऐसा कदम उठाया जिससे सारे प्रभारी औधें मुंह जा गिरे क्योकि उनको संस्था के प्रभारी तो बनाये रखा पर उनको किसी आगंतुक से वार्ता करने अथवा कोई आश्वासन देने और किसी की पैरवी ना करने का आदेश जारी कर दिया। अब हालत यह हैं कि तमाम लोग प्रभारी तो हैं लेकिन केवल देखने के हैं और इसी के चलते संस्था में भूचाल सा मचा हुआ है।
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