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शिक्षा सत्र के सात दिन बीते, निजी स्कूलों की मनमानी पर नहीं लगा अंकुश

शिक्षा सत्र के सात दिन बीते, निजी स्कूलों की मनमानी पर नहीं लगा अंकुश।

कागज़ी घोड़े दौड़ा रहे अफसर।

स्कूलों में जाकर क्यों चेक नहीं करते बच्चों के बेग।

बदांयू 8 अप्रैल।

शिक्षा सत्र के सात दिन बीत गए, लेकिन निजी स्कूल संचालकों की मनमानी पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। अभिभावक राजेन्द्र प्रसाद, महेंद्र यादव, श्रीकृष्ण, सुरेंद्र कुमार यादव का कहना है कि निजी विद्यालयों में एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों के बजाय निजी प्रकाशकों की किताबें काफी कीमत पर खरीदनी पड़ रही हैं। केवल किताबों के लिए चार हजार से आठ हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं।

शिकायत के बाद भी निजी स्कूल संचालकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा सकी है।

जिले के विद्यालयों में एक अप्रैल से नया शिक्षा सत्र शुरू हो गया है। निजी स्कूलों की तरफ से पाठ्यपुस्तकों और फीस को लेकर अभिभावकों की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं।

सरकार की तरफ से पहली से 12वीं कक्षा तक एनसीईआरटी की किताबें लागू करने के निर्देश के बाद भी अधिकांश स्कूलों में इसका पालन होता नहीं दिख रहा है। परेशान अभिभावकों को निजी प्रकाशकों की अधिक कीमत पर किताबें खरीदनी पड़ रही हैं।

अभिभावकों की मानें तो एडमिशन फीस, परीक्षा शुल्क सहित अलग-अलग मदों में जोड़कर फीस ली जा रही है, जिससे शिक्षा अब आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रही है। इसके अलावा कुछ स्कूलों द्वारा कॉपी, पुस्तकें और यूनिफॉर्म चुनिंदा दुकानों से खरीदने को भी कहा जा रहा है।
इन्हें खरीदने में अभिभावकों के पसीने छूट रहे हैं।

सब मिलाकर अभिभावकों पर हर साल एक बच्चे पर 40 से 55 हजार रुपये तक का बोझ पड़ जाता है।
जिलाधिकारी व जिला विद्यालय निरीक्षक का कहना है कि लिखित शिकायत मिलने पर मामले की जांच कराई जाएगी। जांच में गड़बड़ी मिलने पर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।

अधिकारी सिर्फ कागजी घौडे दौड़ा रहे हैं अगर प्राईवेट स्कूलों की मनमानी की सच्चाई जाननी है तो क्यों ना स्कूलों में जाकर बच्चों के बेग चेक करें सच्चाई खुलकर सामने आ जाएगी। कोई आदेश जारी करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, विद्यार्थियों के बस्ते सच्चाई उगल देंगे, फिर देखेंगे कि किस स्कूल पर कार्रवाई होती है।

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