भाजपा की प्रयोगशाला और सपा की उपयोगशाला से बदायूं वाले परेशान !
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
वर्तमान से लगभग चालीस वर्ष पूर्व कांग्रेस ने बदायूं की धरती पर इलाहबाद निवासी को उम्मीदवार बनाकर जो खेल खेला था उसका खमियाजा कांग्रेस के साथ स्थानीय नागरिकों को उठाना पडा। 1984 में कांग्रेस के टिकट पर सलीम इकबाल शेरवानी एक बार सांसद बने लेकिन बाद में सपा में शामिल होकर उन्होनंे बदायूं में 20 वर्ष अपनी तोप से सलामी दी जबकि बदायूं वाले 1984 से लेकर अब तक अपने क्षेत्र का सांसद बनाने के लिए ना जाने कितने पापड बेल चुके हैं और पिछले बीस वर्षो से तो ऐसा लगता है कि सपा ने बदायूं को उपयोगशाला और भाजपा ने बदायूं को प्रयोगशाला सा बनाकर रख दिया है और हालत यह हो गई है कि ना तो सपा की उपयोग सीमा पूरी हो रही है और ना ही भाजपा के प्रयोग भाजपा को कामयाबी की राह पर लाते नजर आ रहे हैं। इस अवधि में सपा ने सलीम शेरवानी, धर्मेंद्र यादव और आदित्य यादव को बदायूं से सांसद बनाने की राह बनाई जबकि इस अवधि में भाजपा ने दो बार शाहजहांपुर निवासी स्वामी चिन्मयानन्द और कुशीनगर की डा संघमित्रा मौर्य को बदायूं का सांसद बनवाने की राह तो प्राप्त की लेकिन पिछले संसदीय चुनाव में फिर से नया और बाहरी उम्मीदवार के रूप में दिग्विजय सिंह शाक्य का प्रयोग किया जो भाजपा के क्षेत्रीय अध्यक्ष हैं लेकिन उनका प्रयोग भाजपा के लिए बहुत खराब इस लिए साबित हुआ क्योंकि बदायूं से श्री शाक्य के अलावा आंवला संसदीय सीट से भाजपा के सांसद श्री कश्यप भी चुनाव में पराजित हो गए और बात मात्र बदायूं और आंवला की नहीं भाजपा की गुटबाजी के चलते और नए प्रयोग की रणनीति में संभल सीट पर भी भाजपा जीत हासिल नहीं कर सकी। अब आने वाले समय में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं और टिकट की चाहत रखने वाले अपने – अपने दल में अपनी खिचडी पकाने में लगे हुए हैं जबकि उनके विरोधी का रायता फैलाने में कोई कसर बाकी छोडने के मूड में नहीं दिख रहे और ऐसा हुआ तो यह कहना तो जल्दबाजी होगी किसका टिकट कटेगा और किसको टिकट मिलेगा लेकिन जो आसार दिख रहे हैं उनसे तो ऐसा लग रहा है कि विधानसभा चुनाव में बदलाव की ऐसी ब्यार आएगी जिसमें अच्छे – अच्छे अपनों से दूर होते नजर आएगें। किसी की पार्टी और झंडा बदलता नजर आ सकते हैं तो कोई यहां की पतंग वहां से उडाने के लिए बदले मैदान में चुनाव में दिख सकता है।
भाजपा हो या सपा दोनों राजनेतिक दलों के पास दरियां बिछाकर पूरा जीवन सेवा करने में वालों के लिए कहीं पर जगह नहीं दिख रही है और यही कारण है कि जनपद के तमाम गली – कूचों से गोरा हो या काला हो लेकिन अपने क्षेत्र वाला हो की आवाज आए दिन सुनने को मिल रही है।
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