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आलू की पिछेती फसल पर झुलसा रोग का खतरा ?

आलू की पिछेती फसल पर झुलसा रोग का खतरा ?

बिल्सी बदांयू 19 दिसंबर।

तापमान में तेज गिरावट के साथ आद्रता बढ़ने से आलू की पिछेती फसल में झुलसा रोग फैलने की आशंका है। यह मौसम दलहनी और तिलहनी फसलों के लिए भी अनुकूल नहीं माना जा रहा।

नमी और गिरते तापमान से फफूंद जनित रोग का खतरा बढ़ गया है। कृषि विभाग ने किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी। कृषि बैज्ञानिकों ने बताया कि आलू की फसल में जब तापमान 10 से 20 डिग्री सेल्सियस के बीच और वायुमंडलीय आद्रता 80 प्रतिशत से अधिक हो जाती है तो पिछेती झुलसा रोग की प्रबल संभावना रहती है।

यह एक फफूंद जनित और अत्यंत घातक रोग है, जो फसल के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकता है।उन्होंने बताया कि पिछेती झुलसा रोग की शुरुआत पत्तियों के किनारों से होती है और धीरे-धीरे अंदर की ओर फैलती है। इस रोग में पत्तियों पर पानी जैसे धब्बे बनते हैं, जो ठंडे और नम मौसम में तेजी से फैलते हैं। इसका असर पत्तियों, तनों के साथ-साथ कंदों पर भी दिखाई देता है।

उन्होंने किसानों को सलाह दी कि रोग के जैविक प्रबंधन के लिए स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस की 5 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में या बैसिलस सबटिलिस आधारित बायो-फंजीसाइड्स की 3 से 4 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। रासायनिक रोकथाम के लिए मैंन्कोजेब 75 प्रतिशत डब्लूपी की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। यदि फसल में पिछेती झुलसा के लक्षण दिखाई देने लगें तो मेटालेक्सिल 4 प्रतिशत मैंन्कोजेब 64 प्रतिशत डब्लूपी की 2-2 ग्राम मात्रा या सायमोक्सानिल 8 प्रतिशत मैंन्कोजेब 64 प्रतिशत डब्लूपी की 2.5-2.5 ग्राम मात्रा अथवा फ्लूओपिकोलाइड प्रोपामोकार्ब की 2-2 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। साथ ही उन्होंने आलू की फसल की सुबह-शाम नियमित निगरानी करने और रोग के शुरुआती लक्षण दिखते ही तुरंत उपचार करने साथ ही ऐसे मौसम में फसल में नमी बनाए रखने के लिए हल्की सिंचाई करने की सलाह भी दी।

अमन वार्ष्णेय

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