जाएं तो जाएं कहां और रोये तो रोयें कहां, बदहाल सडकें निकालें धुआं ?
बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बदायूं शहर की सडकों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है लेकिन हमारे पालनहारों को सडकों की बदहाली दिखाई नहीं दे रही अथवा हमारे पालनहार जानकारी ना होने का नाटक कर वोट की ताकत से मिलने वाली कुर्सी पर बैठकर मौज लेने में इतने मशगूल हैं कि अभी उनको जनता की तरफ देखने की जरूरत महसूस नहीं हो रही। मजेदार बात यह है कि चुनाव के समय सुख और दुख में शामिल होने का वादा करने वालों को जब मतदाताओं से रिश्ते निभाना याद है तो सडकों की बदहाली दूर कराने का दायित्व कब याद आएगा। शहर में रेलवे ओवरब्रिज के नीचे, इंदिरा चौक से मैके हलवाई की दुकान तक, मालगोदाम रोड, नंगला मंदिर मार्ग, सुभाष चौक से आर्य समाज चौक, श्रारत मिलाप गली, जफा की कोठी से शहबाजपुर और टिकटगंज में वाहन लेकर चलना तो दूर पैदल निकलने में राहगीरों की नानी की कहानी याद आ रही है पर हमारे पालनहारों ने ऐसा काला चश्मा लगा लिया है जिसमें उनको बस अपने मतलब की बात दिखाई देती ह ैजनता का दर्द और जनता की आवाज सुनाई नहीं देती।
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