ना मैं कहूं तेरी और ना तू कहें मरी, भुगते वह जो बात कहें खरेरी ?
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
सहसवान में विवाद की घटना ने पुराने समय का वह किस्सा चर्चा में ला दिया है जिसमें दो की लडाई में तीसरे के मजा लेने की बात कही जाती है। अब यहां दो पक्ष तो सब समझते हैं और तीसरा प्रश्न वाचक चिंह में है जो अपनी मर्जी हो गलत सूचना देने वाले को कानून का रास्ता दिखाता है और अपनी मर्जी हो तो दोनों पक्षों के बीच समझौता होने की बात कह कर तीसरा पक्ष बन जाता है लेकिन आम आदमी को लगता है कि तीसरे पक्ष की यह भूमिका अपनी मर्जी से नहीं किसी चौथे पक्ष की जी हुजूरी में बनाई जाती है। अब शिकायत के मूल पहलू का मंथन करें तो कल दोनों पक्ष एक – दूसरे के खिलाफ कपडे फाडेे जाने असलियत सामने आने की बात कह रहे थे वह दोनों पक्ष रातों रात एक दूसरे के इतने करीबी हो गए जो कार्रवाई नहीं चाहते मतलब ना तू कहे मेरी और ना मैं कहू तेरी की राह पर चलने को मजबूर हो गए पर बदायूं वालों यह तो सोचों कि इसमें भूमिका किसी की पर सजा वह भुगतेगें जिनके रथ पर दोनों पक्ष सवार होकर खुद को खुदा समझ रहे थे।




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