यौमे-वफ़ात पर याद किए गए अज़ीम शायर शकील बदायूँनी
“काँटों से गुज़र जाता हूँ दामन को बचा कर,
फूलों की सियासत से मैं बेगाना नहीं हूँ।”
उर्दू अदब और हिंदी सिनेमा के बेमिसाल शायर शकील बदायूँनी की यौमे-वफ़ात (20 अप्रैल) पर उन्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत।
3 अगस्त 1916 को बदायूं में जन्मे शकील अहमद ने अपने शहर से मोहब्बत में “बदायूँनी” अपने नाम के साथ जोड़ लिया—और यही नाम आगे चलकर शायरी की दुनिया में अमर हो गया।
उनकी शायरी में नज़ाकत, सादगी और गहराई का ऐसा संगम था, जो सीधे दिल में उतर जाता है। संगीतकार नौशाद के साथ उनकी जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए।
बैजू बावरा का “मन तड़पत हरि दर्शन को आज”,
मुगल-ए-आज़म का “प्यार किया तो डरना क्या”
और चौदहवीं का चाँद का टाइटल गीत—आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।
1960 में “चौदहवीं का चाँद” के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।
20 अप्रैल 1970 को वह इस दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनकी शायरी आज भी हर उस दिल में ज़िंदा है, जो मोहब्बत, सच्चाई और इंसानियत को महसूस करता है।
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