क्या और कैसे बतलायूं, यही तो है मेरा प्यारा बदायूं !
बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
कभी बदायूं की पहचान यहां की गंगा – जमुनी तहजीब को लेकर होती है तो कभी सहित्यकारों ने बदायूं को साहित्यक पहचान दी जिसमें शकील बदायूं जैसे प्रसिद्ध गीतकारों ने बदायूं को विश्व स्तर पर चमकाने का कार्य किया तो कभी फिल्म निर्माता राज कपूर की फिल्म प्रेम रोग की कहानी की लेखिका कामना चंद्रा ने बदायूं का सहित्य पताका को गगन में लहराने की कार्य किया। इसके बाद जनपद में विकास का दौर आया जिसमें बबराला क्षेत्र में टाटा कारखाने की स्थापना हुई। बिसौली में डीपी यादव ने गन्ना फैक्ट्री से बदायूं को पहचान दी लेकिन इसी दौर में ग्राम उतरना में कूढा निस्तारण केंद्र बना और राजनीति की भेंट चढ कर सरकारी धन ठिकाने लग गया। कभी सफेदपोंशों की कृपा से अपहरण को उद्योग का दर्जा मिला तो कभी दातागंज के गंगा तट वाले क्षेत्र ने बदायूं को यूपी का चम्बल जैसी पहचान देने का कारनामा किया। कभी बदायूं में मेडीकल कालिज ने बदायूं को पहचान दी तो उसी दौरान भूमिगत विद्युत योजना ने विकास की पहचान देने वालों को बदायूं से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक ऐसी जनचर्चा का विषय बना दिया जिसके दोनो पक्ष एक राजनेतिक दल के थे। यह तो बातें रही बीते समय की अगर पिछले कुछ वर्षों पर निगाह डाले तो बदायूं के कछला गंगा घाट पर होने वाली श्री गंगा आरती से पहचान मिली तो उझानी के मैंथा प्लान्ट में लगी आग ने जनपद को अलग तरीके से पहचान दिलाई जबकि जनपद के थाना मूसाझाग के ग्राम सैंजनी में स्थित एचपीसीएल प्लांट में दिनदहाडे दो अधिकारियों की गोली मारकर हत्या की घटना ने ऐसी कोहराम मचाने वाली पहचान दी जिसके लपेटे में आकर तमाम पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई जबकि जिले की विकास की राह बनाने के लिए स्थािपत एचपीसीएल का सैंजनी वाला प्लांट बंद हो गया और संजैनी के कारखाने में होने वाले दोहरे हत्याकांड ने बदायूं का ेअब तक सबसे बहुचर्चित और शर्मनाक पहचान देने जैसा काम किया है।
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