बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
आजादी से पहले और आजादी के बाद हालात कोई भी हों, राजनेतिक दल कोई हो, समाजसेवी कोई हो, खेल का मैदान हो या सेवा की बात हो इसमें कितना हुआ अथवा नहीं इस पर बात आज नहीं करनी क्योंकि आज दिल है बदायूं की राजनीति में चमचों की रणनीति और चमचों के उस चक्रव्यूह का जिसमें फंस कर बडे बडे लोगों के सिंहासन हिल गए और किये कराये पर चमचों ने पानी फेर दिया।
वैसे तो हर युग में चमचों का प्रभाव देखने को मिला है लेकिन जब से राजनीति में निधि और सेवा में विधि तथा शिक्षा में अनुदान का खेल शुरू हुआ तब से चमचों का उत्पादन बडी तेजी हुआ यह बात आम आदमी जानता है। मैदान कोई हो यह चमचे जिसमें दम उसके साथ हम की भूमिेका में दिखाई देते हैं और कुछ ही समय में इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि चमचों के चक्रव्यूह में फंसे इंसान को पुराने साथियों की कुर्बानी दिखना बंद हो जाती है क्योंकि चमचे कमाउ पूत बनकर उसकी तिजोरी भरने का ऐसा रास्ता दिखाते हैं जो वर्तमान की सबसे बडी जरूरत बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षो से जिले की राजनीति में छाय चमचों ने कुछ ऐसा रंग दिखाया है जिसने बडे बडे राजेताओं के नीचे से कुर्सी खींचने का वह काम कर दिया जो बहुत मुश्किल नजर आता था। चमचों ने किसी को बिजली के काम में फंसा दिया तो गाय और गंगा से हिला दिया और समय के साथ फिर जिसमें दम उसके हम की राह पर चलते हुए फूल के झुंड में शामिल होकर वहां पर अपना रंग दिखा रहे है।
चमचागिरी जिंदाबाद और उससे अपना घर आबाद करने वालों को महारथी कब और कैसे मुक्ति पाएगें अब इसका जवाब आम आदमी तो दे सकता।














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