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चाँद पर पहुँच गए, पर धरती पर रहना नहीं आया – आचार्य संजीव रूप

साप्ताहिक सत्संग

चाँद पर पहुँच गए, पर धरती पर रहना नहीं आया : आचार्य संजीव रूप

बिल्सी। तहसील क्षेत्र के यज्ञ तीर्थ गुधनी स्थित प्रज्ञा यज्ञ मंदिर में आर्य समाज का साप्ताहिक सत्संग आयोजित किया गया। सर्वप्रथम ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 48वें सूक्त के मंत्रों से राष्ट्र कल्याण की भावना के साथ आहुतियाँ दी गईं।

यज्ञ के उपरांत सुप्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य संजीव रूप ने कहा, “इस धरती पर केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु, पक्षी, कीट-पतंग, जलचर और नभचर प्राणी भी रहते हैं। मनुष्य और अन्य जीवों में चार बातें समान होती हैं—आहार, निद्रा, भय और मैथुन। किंतु मनुष्य को इसलिए श्रेष्ठ माना गया है कि उसके पास जानने, सीखने, आविष्कार करने तथा स्वयं को निरंतर विकसित करने की बौद्धिक क्षमता है।

उन्होंने कहा कि आज मनुष्य ने भौतिक उपलब्धियाँ तो प्राप्त कर ली हैं, अनेक आविष्कार भी कर लिए हैं, किंतु उसके भीतर ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कलह, फूट, लोभ, लालच, जातिवाद, कुप्रथाएँ तथा मत-मजहब के नाम पर विभाजन जैसी अनेक बुराइयाँ भी बढ़ती जा रही हैं। अपनी संप्रभुता बढ़ाने के लिए एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को तथा एक देश दूसरे देश को मिटाने पर तुला है। सच तो यह है कि मनुष्य चाँद पर पहुँच गया, पर धरती पर रहना नहीं सीख पाया। पक्षियों से अच्छा उड़ना और मछलियों से अच्छा तैरना सीख लिया, लेकिन अच्छा इंसान बनना नहीं सीख पाया।

आचार्य संजीव रूप ने कहा कि आज मनुष्य का न आहार मर्यादित है, न निद्रा और न ही मैथुन, जबकि पशु-पक्षियों का जीवन पूरी तरह मर्यादित होता है। वे अपने कर्म और पुरुषार्थ से जीवन जीते हैं और संतुष्ट रहते हैं, जबकि मनुष्य भीख माँगता है, चोरी करता है, झूठ बोलता है और गलत कार्य करता है, फिर भी दुखी रहता है। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य प्रकृति से सीखकर बुराइयों से बचे, तो वह सुखी और संतुलित जीवन जी सकता है।

इस अवसर पर कुमारी उर्वशी आर्य एवं कुमारी कौशिकी आर्य ने सुंदर भजन प्रस्तुत किए। सत्संग में राकेश आर्य, श्रीमती सूरजवती देवी, श्रीमती गुड्डी देवी, श्रीमती मुन्नी देवी, श्रीमती संतोष कुमारी, वंश कुमार सिंह, नीरेश कुमार आर्य सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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