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धर्म और न्याय के रक्षक भगवान पशुराम पंडित सचिन शर्मा

*चिरंजीवी भगवान परशुराम धर्म और न्याय की पुनर्स्थापना हेतु अवतरित हुए थे। उनके जन्मोत्सव (19 अप्रैल )पर विशेष*…

सहसवान (बदायूं )हिंदू धर्म में छठे अवतार भगवान परशुराम सदियों से धर्म और न्याय के प्रतीक बने हुए हैं। उनका जन्म वैशाख शुक्ल तृतीया अर्थात अक्षय तृतीया को हुआ था। उनके पिता महर्षि जमदग्नि और मां रेणुका धर्मपरायण थे। परशुराम जी का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ, लेकिन उनका स्वभाव और कर्म एक योद्धा के समान था। इसलिए उन्हें “ब्रह्म-क्षत्रिय” कहा जाता है। उनका नाम ‘परशुराम’ दो शब्दों ‘परशु’ (फरसा)और ‘राम’ से बना है। कहा जाता है कि परशु उन्हें भगवान शिव ने प्रदान किया था। वे शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण थे। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान और साहस का अद्भुत मिश्रण था। परशुराम जी का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी से अधर्मी और अत्याचारी क्षत्रियों का नाश करना था। उनके समय में कई राजा अहंकारी और अन्यायी बन गए थे। वे अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके आम जनता को कष्ट पहुंचाते थे। हिंदू पौराणिक ग्रंथो के अनुसार, परशुराम जी ने अत्याचारी राजाओं का संहार किया और धर्म की स्थापना की । उनके इस कार्य से समाज में न्याय और शांति के हुई। परशुराम जी केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान शिक्षक भी थे। उन्होंने महाभारत काल के कई प्रमुख योद्धाओं को युद्ध और अस्त्र-शास्त्र की शिक्षा दी। उनके प्रमुख शिष्य भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण थे। इनकी शिक्षा से यह शिष्य युद्ध कला में निपुण बने और इतिहास में अमर हो गए। अक्षय तृतीया को परशुराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है, जिसे इसे अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन पूजा, दान और अच्छे कार्य करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन किए पुण्य कार्यों का फल समाप्त नहीं होता। परशुराम जी को चिरंजीवी यानी अमर माना जाता है। कहा जाता है कि वे आज भी पृथ्वी पर रहते हैं। और आवश्यकता पड़ने पर धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होते हैं। वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं। उनकी अमरता और धर्म रक्षा की विशेषता उन्हें अन्य अवतारों से अलग बनाती है। भगवान परशुराम के कार्य और जीवन समाज और मानवता के लिए प्रेरक हैं। उन्होंने अधर्मी और अत्याचारी लोगों का नाश करके धर्म की स्थापना की। उनका जीवन यह सिखाता है की शक्ति, ज्ञान और कौशल का प्रयोग हमेशा धर्म और समाज की भलाई के लिए होना चाहिए।

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