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बिल्सी बदांयू 1 नवंबर।
देवोत्थानी एकादशी, जिसे प्रबोधनी एकादशी भी कहते हैं। इसे अत्यंत पवित्र दिन माना जाता है। सनातन संस्कृति में इसका विशेष महत्व है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह बाद योग निंद्रा से जागते हैं, जिससे शुभ कार्य एवं वैवाहिक कार्यक्रम शुरू होते हैं।
पं दिनेश चंद्र पाठक ने बताया कि कार्तिक माह शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 1 नवंबर को सुबह 9:11 बजे पर प्रारंभ होकर रविवार 2 नवंबर को सुबह 7:31 बजे तक रहेगी। तिथि के मुताबिक 1 नवंबर यानी शनिवार को को देवोत्थानी एकादशी मनाई जाएगी।
इस दिन शतभिषा नक्षत्र शाम 6 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। इस दौरान ध्रुव योग का भी संयोग है। एकादशी पूजन से पहले घर में गंगाजल का छिड़काव करें। फिर पीले रंग के वस्त्र धारण करें और पूजन के लिए भगवान विष्णु के चरणों की गेरू से आकृति बनाएं। आकृति के पास मौसमी फल, मिठाई, और बेर-सिंघाड़े रखें। पूजा करते समय दान से जुड़ी सामग्री को भी रखें। कुछ गन्ने रखें और छन्नी या डलिया से उसे ढंक दें। आकृति के पास दीपक जलाएं और भगवान विष्णु, देवी लक्ष्मी की पूजा करें। पूजा के समय शंख या घंटी बजाकर उठो देवा, बैठो देवा गीत से सभी देवी-देवताओं को जगाएं।
देव उठनी एकादशी के दिन ही तुलसी-शालिग्राम विवाह का आयोजन किया जाता है। कहा जाता है कि विवाह कराने से सभी मनोरथ पूरे होते है। तुलसी के पौधे को गेरू से सजाकर, गन्ने का मंडप बनाकर, चुनरी ओढ़ाकर और चूड़ियां पहनाकर विवाह का आयोजन करते हैं। भगवान शालिग्राम के साथ तुलसी की परिक्रमा कर विवाहोत्सव संपन्न किया जाता है।
देव उठनी एकादशी पर भगवान श्रीहरि विष्णु के पूजन के लिए शहर में गन्ने, सिंघाड़े और शकरकंद व फलों की खरीदारी की गई। मंडियों में सुबह से लोगों की भीड़ लगी रही। दुकानदारों ने भी मौके का फायदा उठाया। दुकानदारों ने गन्ना 20रुपये प्रति, सिंघाड़े 40 रुपये और शकरकंद 50 रुपये किलो तक बेचे।
अमन वार्ष्णेय
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